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दुर्ग कांग्रेस में नेतृत्व संकट, संगठन सवालों के घेरे में
दुर्ग। शौर्यपथ राजनीति
दुर्गनगर निगम के पूर्व महापौर के रूप में धीरज बाकलीवाल की पहचान एक शालीन, सौम्य और मिलनसार जनप्रतिनिधि की रही है। आम जनता के बीच उनका व्यवहारिक व्यक्तित्व स्वीकार्य रहा, लेकिन सक्रिय संगठनात्मक राजनीति में कदम रखते ही उनकी भूमिका पर अब गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं। शहर कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद जिस ऊर्जा, आक्रामकता और जमीनी सक्रियता की अपेक्षा कार्यकर्ताओं को थी, वह अब तक दिखाई नहीं दे सकी है।
अध्यक्ष नियुक्ति के साथ ही सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक मीम—जिसमें पैसे देकर अध्यक्ष बनने का तंज कसा गया—को शुरुआत में लोगों ने हल्के-फुल्के व्यंग्य के तौर पर लिया। लेकिन बीते कुछ महीनों की संगठनात्मक कार्यप्रणाली ने उस मज़ाक को अब एक राजनीतिक बहस में बदल दिया है। कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा आम हो चुकी है कि क्या दुर्ग कांग्रेस वास्तव में मजबूत हो रही है या सिर्फ चेहरों का बदलाव हुआ है?
वरिष्ठ नेताओं से दूरी, कमजोर पकड़ का संकेत
धीरज बाकलीवाल के अध्यक्षीय कार्यकाल में सबसे बड़ा सवाल उनकी वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं से बढ़ती दूरी को लेकर खड़ा हो रहा है। दीपक दुबे, आर.एन. वर्मा, अरुण वोरा जैसे अनुभवी नेताओं का मंच से धीरे-धीरे गायब होना केवल संयोग नहीं माना जा रहा। इसके विपरीत, जनसमर्थन खो चुके और सीमित प्रभाव वाले चेहरों के साथ नज़दीकियां संगठन की दिशा पर सवाल खड़े करती हैं।
यह तुलना स्वाभाविक रूप से भाजपा संगठन से की जा रही है, जहां आज भी चंद्रिका चंद्राकर, उषा टावरी, रमशिला साहू, लाभचंद बाफना जैसे वरिष्ठ नेताओं को सम्मान, मंच और संगठनात्मक स्थान प्राप्त है। भाजपा में वरिष्ठ-कनिष्ठ संतुलन को संगठनात्मक मजबूती की रीढ़ माना जाता है, जबकि दुर्ग कांग्रेस में यही संतुलन टूटता नजर आ रहा है।
कार्यकारिणी बनी, लेकिन नाराज़गी भी
जिला व शहर कार्यकारिणी की घोषणा के बाद असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। अनुभवी और संघर्षशील नेताओं को दरकिनार कर अपेक्षाकृत नए और अनुभवहीन लोगों को बड़ी जिम्मेदारियां देना अब चर्चा का विषय बन चुका है। यह नाराज़गी केवल बंद कमरों तक सीमित नहीं रही—कई कार्यकर्ता सोशल मीडिया के माध्यम से प्रदेश नेतृत्व तक अपनी पीड़ा पहुंचाने लगे हैं।
हाल ही में कांग्रेस कार्यालय से जारी एक तस्वीर, जिसमें अध्यक्ष सभी पदाधिकारियों से मुलाकात करते दिखाई देने थे, उल्टा असर डाल गई। तस्वीर में चंद लोगों की मौजूदगी ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या संगठन के भीतर ही संवाद टूट रहा है?
भूपेश बघेल की पसंद पर भी सवाल
धीरज बाकलीवाल का चयन छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके भूपेश बघेल की पसंद के रूप में हुआ। ऐसे में अब जब संगठनात्मक निष्क्रियता और असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं, तो आलोचना की आंच भूपेश बघेल तक भी पहुंचने लगी है। हालांकि यह स्पष्ट है कि चयन के बाद संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी शहर अध्यक्ष की होती है।
नेता प्रतिपक्ष की निष्क्रियता ने बढ़ाई मुश्किलें
दुर्ग नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष के रूप में संजय कोहले की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। बदहाल निगम व्यवस्था, जनसमस्याएं और प्रशासनिक विफलताओं के बावजूद विपक्ष की आवाज़ कमजोर रही है। इसे भी धीरज बाकलीवाल के निर्णयों और नेतृत्व क्षमता से जोड़कर देखा जा रहा है।
अस्तित्व की लड़ाई या नई शुरुआत?
आज दुर्ग कांग्रेस एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। सवाल साफ है—
क्या धीरज बाकलीवाल मजबूत इच्छाशक्ति, स्पष्ट निर्णय और समावेशी नेतृत्व के साथ मैदान में उतरेंगे?
या फिर कांग्रेस दुर्ग में केवल दस्तावेजों और पुरानी स्मृतियों तक सिमट कर रह जाएगी?
आने वाले चुनाव सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि कांग्रेस के संगठनात्मक अस्तित्व की परीक्षा होंगे। अब देखना यह है कि अध्यक्ष पद की कुर्सी धीरज बाकलीवाल के लिए अवसर बनती है या उनकी राजनीतिक उलटी गिनती की शुरुआत।
दुर्ग। शौर्यपथ। भारतीय जनता पार्टी पर “दागदार नेताओं को सर्फ से धोकर राजनीति में शामिल करने” का आरोप लगाने वाली कांग्रेस अब खुद उसी आरोपों के घेरे में नजर आ रही है। दुर्ग ग्रामीण कांग्रेस की नई कार्यकारिणी समिति के गठन के बाद महामंत्री पद पर लक्ष्मी साहू की नियुक्ति ने संगठन के भीतर और बाहर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है।
हाल ही में घोषित ग्रामीण कांग्रेस की जंबो कार्यकारिणी में पूर्व जिला पंचायत सदस्य लक्ष्मी साहू को महामंत्री बनाया गया। जैसे ही उनका नाम सूची में सामने आया, राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। सवाल उठने लगे—क्या दुर्ग ग्रामीण कांग्रेस में साफ-सुथरी छवि वाले नेताओं की कमी हो गई है? या फिर कांग्रेस भी अब उसी “वाशिंग मशीन” राजनीति की राह पर है, जिसका वह विरोध करती रही है?
नियुक्ति पर उठे सवाल, संगठन में असंतोष की आहट
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जब कांग्रेस पहले से ही बैकफुट पर मानी जा रही है, ऐसे समय में यह नियुक्ति पार्टी के भीतर असहजता का कारण बन गई है। सूत्रों के अनुसार, कुछ कांग्रेसी सदस्य ही इस निर्णय पर सवाल उठा रहे हैं। चर्चा का केंद्र दुर्ग ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष राकेश ठाकुर की कार्यशैली भी बन गई है।
लक्ष्मी साहू का नाम हाल ही में एक विवाद के कारण भी सुर्खियों में रहा है। रसमड़ा निवासी संतोष रामटेक ने पुलिस अधीक्षक को शिकायत सौंपकर लक्ष्मी साहू, उनके पति यशवंत साहू और मोनिका साहू पर गंभीर आरोप लगाए हैं। शिकायत में आरोप है कि कांग्रेस पार्टी के नाम पर नौकरी दिलाने का झांसा देकर पैसे लिए गए और कार्य न होने पर रकम वापस मांगने पर कथित रूप से धमकी दी गई। संतोष रामटेक ने यह भी दावा किया है कि उनकी मां के साथ मारपीट की गई, जिसका वीडियो उन्होंने सबूत के तौर पर प्रस्तुत करने की बात कही है।
हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि या पुलिस द्वारा किसी निर्णायक कार्रवाई की जानकारी अभी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है, लेकिन राजनीतिक चर्चा में इन आरोपों का उल्लेख प्रमुखता से हो रहा है।
क्या संगठन को अंधेरे में रखा गया?
लक्ष्मी साहू की नियुक्ति के बाद यह भी चर्चा उठी कि क्या राकेश ठाकुर ने संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को विश्वास में लिया था? क्या यह निर्णय सर्वसम्मति से हुआ या शीर्ष स्तर पर तय कर दिया गया?
राकेश ठाकुर की ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के समय भी संगठन के भीतर विरोध के स्वर सुनाई दिए थे। ऐसे में अब यह नया विवाद उनके नेतृत्व पर दोबारा सवाल खड़े कर रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि हाल ही में लक्ष्मी साहू का रामटेक परिवार से विवाद सामने आया था, जिससे यह मुद्दा और संवेदनशील बन गया है।
‘काबिलियत या सेटिंग’ की बहस
संगठन के भीतर यह भी फुसफुसाहट है कि क्या नियुक्तियां काबिलियत के आधार पर हो रही हैं या “सेटिंग” के जरिए? क्या कांग्रेस में सर्वसम्मति और सामूहिक निर्णय की परंपरा कमजोर पड़ रही है?
पूर्व में भी राकेश ठाकुर पर दुर्ग में कांग्रेसी नेताओं के फोटो पोस्टरों से हटवाने को लेकर विवाद खड़ा हो चुका है। ऐसे में यह नया घटनाक्रम उनकी कार्यप्रणाली को लेकर आलोचनाओं को और बल दे रहा है।
कांग्रेस की छवि पर असर?
राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप और चर्चा होना सामान्य बात है, लेकिन जब हर चर्चा नकारात्मक दिशा में जाए तो उसका असर संगठन की छवि पर पड़ना स्वाभाविक है। दुर्ग ग्रामीण कांग्रेस अब अपनी जंबो टीम के साथ राजनीतिक मुकाबले के लिए मैदान में उतर चुकी है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि यह चयन प्रक्रिया भविष्य में संगठन को मजबूती देती है या आंतरिक असंतोष को और बढ़ाती है।
फिलहाल, लक्ष्मी साहू की नियुक्ति ने दुर्ग की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले समय में पुलिस जांच और संगठनात्मक प्रतिक्रिया किस दिशा में जाती है, यही तय करेगा कि यह विवाद अस्थायी राजनीतिक शोर है या कांग्रेस के लिए दीर्घकालिक चुनौती।
दुर्ग । छत्तीसगढ़ विधानसभा में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पेश किए गए बजट पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने बजट को 'बेहद अस्पष्ट' करार देते हुए सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह बजट किसानों, मजदूरों, युवाओं और शहर के मध्यम वर्ग की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता।
साहू ने कहा, इस बजट में खेतिहर किसानों, मजदूरों और शहरी मध्यम वर्ग के लिए कोई ठोस प्रावधान नहीं है। रोजगार सृजन, शिक्षा, सिंचाई और युवाओं से जुड़े महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर चुप्पी साध ली गई है। उन्होंने आगे जोर देकर कहा कि कई घोषणाएं केवल कागजों तक सीमित हैं और जमीनी स्तर पर इनका कोई असर नजर नहीं दिखाई देता।
पूर्व गृहमंत्री ने सरकार के पुराने वादों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पूर्व में किए वादों जैसे रोजगार सृजन, सरकारी भर्तियां और युवाओं के लिए योजनाओं पर अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गयी है। लोगों की बेरोजगारी बढ़ रही है, लेकिन बजट में इसका कोई समाधान नहीं दिखता।
रायपुर। शौर्यपथ।
छत्तीसगढ़ विधानसभा में आज प्रस्तुत किया गया राज्य का वित्तीय बजट “डबल इंजन सरकार” की हकीकत दिखाता है, जो राज्य को आगे नहीं ले जा रही, बल्कि पीछे की ओर खींच रही है।
इस बजट में कुल बढ़ोतरी मात्र ₹7,000 करोड़ की है - जिसमें रोज़गार सृजन के लिए कोई ठोस रोडमैप नहीं, इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए कोई स्पष्ट योजना नहीं, और राजस्व सृजन का कोई प्रभावी माध्यम नहीं है।
राज्य के संविदा कर्मचारियों को पिछले 3-3 महीनों से वेतन नहीं मिला है। पिछले वित्तीय वर्ष में जिन कार्यों को स्वीकृति मिली थी, वे या तो अब तक शुरू ही नहीं हो पाए हैं या फिर अधूरे पड़े हैं। अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल का कार्य,और राजधानी के मेकाहारा अस्पताल में प्रस्तावित इंटीग्रेटेड हॉस्पिटल व कैंसर यूनिट आज भी लंबित हैं।
राजस्व सृजन का हाल यह है कि राज्य सरकार महात्मा गांधी के शहीद दिवस और होली जैसे पावन पर्वों के दिन भी शराब की दुकानें खोलकर व्यापार चला रही है, क्योंकि इस सरकार के पास वही एक राजस्व का साधन रह गया है।
जब UPA सरकार की मनरेगा योजना प्रभावी थी, तब पिछली बार इसके लिए लगभग ₹4,000 करोड़ का आवंटन था, जिसमें से राज्य सरकार ने सिर्फ़ ₹400 करोड़ ही खर्च किए - बाक़ी बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार से आया।
अब “VB GRAM G” जैसी योजना के नाम पर राज्य सरकार से ₹1,600 करोड़ खर्च करने की उम्मीद की जा रही है। बजट देखकर साफ़ पता चलता है कि राज्य सरकार इतना खर्च करने में सक्षम नहीं है।
इसका सीधा असर ग्रामीण छत्तीसगढ़ में रोज़गार के अवसरों में कमी और इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास की रफ़्तार पर पड़ेगा।
विकास की गाड़ी रिवर्स में डाल दी गई है और प्रदेश को आर्थिक व मौलिक पतन की ओर धकेला जा रहा है।
केंद्र और राज्य की सरकारें मिलकर छत्तीसगढ़ की जनता को सिर्फ़ झूठे वादों में उलझाने का काम कर रही हैं।
कार्यकारिणी घोषित होते ही कार्यकर्ताओं में निराशा, गुटबाजी के संकेत तेज
दुर्ग।
दुर्ग शहर कांग्रेस की नई कार्यकारिणी की घोषणा के साथ ही संगठन के भीतर उम्मीदों की जगह निराशा की चर्चा तेज हो गई है। चार दशक तक दुर्ग कांग्रेस की कमान वोरा परिवार के प्रभाव में रही। लंबे अंतराल के बाद छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पसंद के अनुरूप पूर्व महापौर धीरज बाकलीवाल को शहर अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। तब यह माना जा रहा था कि संगठन में नई ऊर्जा और सक्रियता का संचार होगा।
लेकिन अध्यक्ष पद संभालने के लगभग चार माह बाद भी कार्यकर्ताओं के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि संगठन में अपेक्षित बदलाव नजर नहीं आ रहा।
वोरा बंगले से बाकलीवाल बंगले तक?
शहर में यह चर्चा आम है कि दुर्ग कांग्रेस की राजनीति केवल “चेहरों के बदलाव” तक सीमित रह गई है। पहले जो प्रभाव एक परिवार विशेष का माना जाता था, अब वही केंद्रीकरण दूसरे खेमे में सिमटता दिखाई दे रहा है। कार्यकारिणी की घोषणा के बाद यह धारणा और मजबूत हुई है कि निर्णय प्रक्रिया कुछ सीमित लोगों तक केंद्रित हो गई है।
कई कार्यकर्ता खुलकर तो नहीं, परंतु निजी बातचीत में यह कहने लगे हैं कि संगठन “रिमोट कंट्रोल” से संचालित होता प्रतीत हो रहा है।
गुटबाजी की आहट और सामाजिक संतुलन पर सवाल
नई कार्यकारिणी में कुछ अनुभवहीन चेहरों को प्रमुख जिम्मेदारी दिए जाने पर भी चर्चा गर्म है। वहीं सतनामी समाज, ताम्रकार समाज , बरई समाज और उड़िया समाज जैसे प्रभावी वर्गों की कथित अनदेखी को लेकर भी असंतोष सामने आ रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दुर्ग जैसे सामाजिक रूप से विविध शहर में संतुलन साधना संगठनात्मक मजबूती की पहली शर्त होती है। यदि सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठते हैं, तो उसका असर चुनावी समीकरणों पर भी पड़ सकता है।
प्रवक्ताओं की निष्क्रियता भी चर्चा में
कांग्रेस संगठन में प्रवक्ताओं की भूमिका सरकार और निगम की नीतियों के खिलाफ मुखर विपक्ष तैयार करने की होती है। लेकिन वर्तमान संरचना में कुछ निष्क्रिय चेहरों को पुनः स्थान दिए जाने से यह संदेश जा रहा है कि संगठन आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभाने के मूड में नहीं है।
सोशल मीडिया और जनसंपर्क के दौर में यह कमी संगठन की राजनीतिक धार को कमजोर कर सकती है।
निगम में विपक्ष की भूमिका पर भी प्रश्नचिन्ह
पूर्व महापौर धीरज बाकलीवाल की पसंद से बने नेता प्रतिपक्ष की सक्रियता को लेकर भी कार्यकर्ताओं में असंतोष है। नगर निगम की बदहाल व्यवस्थाओं, नागरिक समस्याओं और विकास कार्यों में कथित अनियमितताओं के मुद्दों पर अपेक्षित आक्रामकता दिखाई नहीं दी।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि जब विपक्ष जनता की आवाज नहीं बन पाता, तो संगठन की विश्वसनीयता स्वतः कमजोर होती है।
क्या पूर्व मुख्यमंत्री के फैसले पर उठेंगे सवाल?
शहर अध्यक्ष की नियुक्ति पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पसंद के अनुरूप मानी जाती रही है। ऐसे में अब संगठन के भीतर उठती आलोचनाओं को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि खुलकर कोई सामने नहीं आ रहा, परंतु यह संकेत मिल रहे हैं कि यदि स्थिति नहीं बदली तो असंतोष सार्वजनिक रूप ले सकता है।
आने वाले चुनाव की परीक्षा
नई कार्यकारिणी घोषित हो चुकी है। अब असली परीक्षा आने वाले चुनावों में होगी। क्या यह टीम अनुभवहीनता के आरोपों से ऊपर उठकर संगठन को नई दिशा दे पाएगी?
या फिर पद ग्रहण की औपचारिक खुशियों तक ही सीमित रह जाएगी?
दुर्ग कांग्रेस के भीतर उठते ये सवाल केवल संगठनात्मक फेरबदल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह आने वाले चुनावी परिणामों की भूमिका भी लिख सकते हैं।
राजनीतिक संदेश स्पष्ट है —
यदि संगठन जमीनी कार्यकर्ताओं को साथ लेकर, सामाजिक संतुलन साधते हुए और आक्रामक विपक्ष की भूमिका में नहीं आता, तो “चेहरे बदलने” से ज्यादा कुछ नहीं बदलेगा।
34 बंग्लादेशी घुसपैठिये छत्तीसगढ़ आये तो यह मोदी सरकार की नाकामी
रायपुर/शौर्यपथ / गृहमंत्री विजय शर्मा के द्वारा 2 साल में गृह विभाग की जो उपलब्धियां बताई गई है वह केवल कागजी और मनगढ़त है। प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि गृह मंत्री प्रदेश की बिगड़ चुकी कानून व्यवस्था के बारे में मौन रहे। राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद आधा दर्जन से अधिक बार जनता बिगड़ती कानून व्यवस्था के विरोध में सड़को पर उतर कर हिंसक आंदोलन करने को मजबूर हुई है। बलौदाबाजार में एसपी कलेक्टर कार्यालय जला दिये गये, कवर्धा में एक व्यक्ति को जिंदा जला दिया गया, तमनार, बलरामपुर, सूरजपुर में जनता ने बिगड़ चुकी कानून व्यवस्था के खिलाफ सड़कों पर उतरी, जब गृह मंत्री प्रेस कांफ्रेंस लेकर अपनी पीठ थपथपा रहे थे तो कोण्डागांव में लोग हिंसक आंदोलन कर रहे थे।
प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि गृह मंत्री कहते है उन्होंने 34 बंग्लादेशी नागरिकों को प्रदेश से बाहर निकाला, उनकी केंद्र सरकार कहती है देश में कोई घुसपैठिये नहीं है। सही कौन बोल रहा, मोदी सरकार या विजय शर्मा? देश में 12 सालों से भाजपा की सरकार है। ऐसे में देश के हृदय स्थल में घुसपैठियों का पहुंचना क्या केंद्र की मोदी सरकार की नाकामी नही है?
प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद प्रदेश की कानून व्यवस्था बिगड़ चुकी है। अपराधिक घटनाओं को रोक पाने में सरकार असफल साबित हो रही है। लूट, हत्या, बलात्कार, चाकूबाजी की घटनाएं विचलित करने वाली है। भाजपा की सरकार बनने के बाद राज्य में महिलायें असुरक्षित हो गयी है। प्रदेश में रोज 8 बलात्कार घटनाएं हो रही है। सरकार समझ नहीं पा रही है कि आपराधिक घटनाओं को कैसे रोका जाये। राजधानी में महीने में 24 रेप हो रहे, 120 चोरियां हो रही, हर दूसरे दिन हत्या हो रहा है।
प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि भाजपा सरकार के 2 साल के कार्यकाल में प्रदेश में ड्रग्स, अफीम, गांजा, हीरोइन, नकली शराब, अवैध शराब बिना रोक-टोक के गली-गली में बिक रहा है, हर चौक-चौराहा में नशीली वस्तु बेचने वालों का गैंग है, जिसके चलते प्रदेश में आपराधिक घटनाएं भी बढ़ी है। प्रदेश में नशेडिय़ों का जमावड़ा हो गया है। सूर्यास्त होने के बाद जिस प्रकार से नशाखोरी हो रहा है, हर वर्ग नशा की ओर आकर्षित हो रहा है, इसकी जिम्मेदारी भाजपा सरकार की है। ये सरकार की असफलता है। यह बेहद चिंता का विषय है सरकार इसे रोकने के लिए केवल घोषणाएं करती है, रोक नहीं पाती।
दुर्ग। शौर्यपथ।
दुर्ग कांग्रेस की राजनीति आज ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ सवाल सिर्फ नेतृत्व का नहीं, बल्कि विपक्ष की भूमिका, उसकी धार और उसकी ईमानदारी पर भी खड़े हो रहे हैं। लगभग पाँच दशक तक दुर्ग कांग्रेस पर एक ही परिवार का वर्चस्व रहा। वोरा परिवार की राजनीति के साये में न जाने कितने कांग्रेसी कार्यकर्ता और नेता उभरने से पहले ही हाशिये पर धकेल दिए गए। प्रदेश स्तर तक पहुंचने की उम्मीद लिए बैठे कार्यकर्ताओं के सपने इसी वर्चस्व में दबकर रह गए।
करीब 50 वर्षों बाद जब प्रदेश कांग्रेस ने दुर्ग कांग्रेस की कमान वोरा बंगले से बाहर निकालकर धीरज बाकलीवाल को सौंपी, तब यह निर्णय सिर्फ एक नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक पुनर्जागरण के संकेत के रूप में देखा गया। उम्मीद थी कि दुर्ग कांग्रेस में नई ऊर्जा आएगी, जमीनी स्तर पर संघर्ष दिखेगा और भाजपा शासित नगर निगम के खिलाफ आक्रामक विपक्ष खड़ा होगा। लेकिन दुर्भाग्यवश, चेहरा बदलाज् व्यवस्था नहीं।
विपक्ष की सबसे बड़ी जिम्मेदारी, जो निभाई नहीं गई
वर्तमान समय में दुर्ग शहर और दुर्ग नगर निगम लगभग समान राजनीतिक और प्रशासनिक दायरे में आते हैं। ऐसे में नगर निगम की बदहाल कार्यप्रणाली के खिलाफ आवाज बुलंद करना कांग्रेस की प्राथमिक जिम्मेदारी थी।
शहर अतिक्रमण से जूझ रहा है,अवैध बाजार फल-फूल रहे हैं,जल संकट आमजन को परेशान कर रहा है,अंधेरे और गड्ढों से भरी सड़कें हादसों को न्योता दे रही हैं,गंदगी और दुर्गंध शहर की पहचान बनती जा रही है।
इन तमाम मुद्दों पर विपक्ष को सड़क से सदन तक संघर्ष करते दिखना चाहिए था। लेकिन दुर्ग कांग्रेस की चुप्पी, उसकी निष्क्रियता और नेतृत्व की कमजोरी ने आम जनता में यह धारणा बना दी है कि विपक्ष केवल नाम का रह गया है।
अध्यक्ष की कमजोरी और नेता प्रतिपक्ष की निष्क्रियता
शहर कांग्रेस अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल से यह अपेक्षा थी कि वे संगठन को एकजुट कर आक्रामक रणनीति अपनाएंगे। मगर उनकी कार्यप्रणाली शुरुआती दौर से ही सवालों के घेरे में है। संगठनात्मक कमजोरी, आंदोलन की कमी और मुद्दों पर स्पष्ट स्टैंड का अभाव उनकी सबसे बड़ी विफलता बनता जा रहा है।
वहीं दूसरी ओर, नेता प्रतिपक्ष संजय कोहले की भूमिका भी गंभीर सवाल खड़े करती है। वार्ड स्तर पर लोकप्रियता अलग विषय हो सकता है, लेकिन नेता प्रतिपक्ष के रूप में बीते एक वर्ष में उनकी भूमिका लगभग निष्क्रिय रही है। जिस तरह से अपने कक्ष और प्रोटोकॉल को लेकर आवाज बुलंद की गई, उससे यह संदेश गया कि पद की चिंता ज्यादा है, जनता की पीड़ा कम।
आज दुर्ग की राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि "विपक्ष भी सत्ता पक्ष की कठपुतली बन चुका है।"परदे के पीछे किसी तरह की 'सेटिंगÓ की आशंका इसलिए भी गहराती है क्योंकि शहर की बदहाली पर नेता प्रतिपक्ष का मौन रहना स्वाभाविक नहीं माना जा सकता।
क्या यह नेतृत्व परिवर्तन एक भूल साबित हो रहा है?
धीरज बाकलीवाल की संगठनात्मक कमजोरी और संजय कोहले की निष्क्रियता ने दुर्ग कांग्रेस को एक बार फिर अस्तित्व की लड़ाई में ला खड़ा किया है। जिन कार्यकर्ताओं ने नए नेतृत्व से उम्मीदें लगाई थीं, आज वही निराश और हताश नजर आ रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है—
// क्या प्रदेश कांग्रेस ने दुर्ग की कमान सौंपते समय जमीनी हकीकत का सही आकलन किया था?
// क्या पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पसंद एक बार फिर दुर्ग कांग्रेस के लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है?
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई क्यों कमजोर पड़ गई?
छत्तीसगढ़ की राजनीति में कांग्रेस हमेशा खुद को भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्षरत पार्टी बताती रही है। लेकिन जब प्रमुख शहरों में ही विपक्ष कमजोर, मौन और निष्क्रिय हो जाए, तो यह दावा खोखला नजर आने लगता है।
अगर विपक्ष ही मजबूत नहीं होगा, तो सत्ता से सवाल कौन पूछेगा?
अगर विपक्ष ही संघर्ष नहीं करेगा, तो जनता की आवाज कौन बनेगा?
दुर्ग कांग्रेस के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि अपनी ही निष्क्रियता है। नेतृत्व में बदलाव केवल नाम बदलने से नहीं होता, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, संघर्ष और सड़क पर उतरने की हिम्मत से होता है।
यदि समय रहते प्रदेश कांग्रेस ने दुर्ग की स्थिति पर गंभीर मंथन नहीं किया, तो यह तय है कि दुर्ग कांग्रेस का पतन और गहराएगा—और इसका खामियाजा सीधे-सीधे कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और आम जनता को भुगतना पड़ेगा।
रायपुर/ शौर्यपथ / मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने नक्सलवाद खात्मे की तिथि 31 दिसम्बर 2026 बताये जाने पर सवाल खड़ा करते हुए प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा नक्सलवाद खात्मे को लेकर क्या केंद्रीय गृहमंत्री एवं मुख्यमंत्री के बीच मतभेद है? केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह नक्सलवाद खात्मे की डेड लाईन 31 मार्च 2026 बताते है, वही गृहमंत्री के साथ बैठक के पश्चात मुख्यमंत्री मीडिया के सवालो का जवाब देते हुए कहते है, 31 दिसम्बर 2026 तक नक्सलवाद खत्म होगा। आखिर क्या चल रहा है? इन दोनों प्रमुखों के बयान से जनता भ्रमित है।सच क्या है? जनता जाना चाहती है। जनता केंद्रीय गृहमंत्री के बयान पर भरोसा करें या राज्य के मुखिया पर?
प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा पूरा प्रदेश चाहता है कि नक्सलवाद खत्म हो।इसकी ठोस रणनीति बने ताकि भविष्य में इस प्रकार से हिंसात्मक गतिविधियों पर पूर्ण रोक लगे। फोर्स और सुरक्षा के जवान लगातार नक्सलियों के खिलाफ आक्रामक कार्यवाही कर रहे है। लेकिन गृहमंत्री और मुख्यमंत्री के बयान का विरोधभास संसय पैदा कर रहा है। क्या केंद्रीय गृहमंत्री हड़बड़ी में है, इसलिये 31 मार्च की बात कर रहे है और मुख्यमंत्री वास्तविकता को जान रहे है, इसलिये 31 दिसम्बर 2026 तक कि डेड लाईन बता रहे है।
प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा नक्सलवाद खात्मे को लेकर मुख्यमंत्री को स्पस्ट जवाब जनता को देना चाहिए। नक्सलवाद के खिलाफ चलाये जा रहे मुहिम में पूरा प्रदेश एक साथ खड़ा हुआ है, लेकिन गृहमंत्री और मुख्यमंत्री के बीच समन्वय की कमी नजर आ रही जो दोनों के अलग-अलग बयान से झलक रहा है। ये प्रदेश के हित में नही है।
रायपुर/ शौर्यपथ / मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने नक्सलवाद खात्मे की तिथि 31 दिसम्बर 2026 बताये जाने पर सवाल खड़ा करते हुए प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा नक्सलवाद खात्मे को लेकर क्या केंद्रीय गृहमंत्री एवं मुख्यमंत्री के बीच मतभेद है? केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह नक्सलवाद खात्मे की डेड लाईन 31 मार्च 2026 बताते है, वही गृहमंत्री के साथ बैठक के पश्चात मुख्यमंत्री मीडिया के सवालो का जवाब देते हुए कहते है, 31 दिसम्बर 2026 तक नक्सलवाद खत्म होगा। आखिर क्या चल रहा है? इन दोनों प्रमुखों के बयान से जनता भ्रमित है।सच क्या है? जनता जाना चाहती है। जनता केंद्रीय गृहमंत्री के बयान पर भरोसा करें या राज्य के मुखिया पर?
प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा पूरा प्रदेश चाहता है कि नक्सलवाद खत्म हो।इसकी ठोस रणनीति बने ताकि भविष्य में इस प्रकार से हिंसात्मक गतिविधियों पर पूर्ण रोक लगे। फोर्स और सुरक्षा के जवान लगातार नक्सलियों के खिलाफ आक्रामक कार्यवाही कर रहे है। लेकिन गृहमंत्री और मुख्यमंत्री के बयान का विरोधभास संसय पैदा कर रहा है। क्या केंद्रीय गृहमंत्री हड़बड़ी में है, इसलिये 31 मार्च की बात कर रहे है और मुख्यमंत्री वास्तविकता को जान रहे है, इसलिये 31 दिसम्बर 2026 तक कि डेड लाईन बता रहे है।
प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा नक्सलवाद खात्मे को लेकर मुख्यमंत्री को स्पस्ट जवाब जनता को देना चाहिए। नक्सलवाद के खिलाफ चलाये जा रहे मुहिम में पूरा प्रदेश एक साथ खड़ा हुआ है, लेकिन गृहमंत्री और मुख्यमंत्री के बीच समन्वय की कमी नजर आ रही जो दोनों के अलग-अलग बयान से झलक रहा है। ये प्रदेश के हित में नही है।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
