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शौर्यपथ विशेष विश्लेषण
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है। उसकी भूमिका सरकार का प्रचारक बनने की नहीं, बल्कि जनता और सत्ता के बीच जवाबदेही का सेतु बनने की होती है। लेकिन जब किसी पत्रकार, एंकर या मीडिया संस्थान पर निष्पक्षता खोने के आरोप लगने लगते हैं, तब उसका असर केवल उसकी व्यक्तिगत साख तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सरकार, लोकतंत्र और पूरे मीडिया जगत पर पड़ता है।
पिछले कुछ वर्षों में देश में एक नई बहस उभरी है। बहस यह कि क्या कुछ टीवी एंकरों की शैली और प्रस्तुति ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचाया है? सोशल मीडिया पर बार-बार यह आरोप लगाया जाता रहा है कि कुछ प्रमुख चेहरे सत्ता से कठिन सवाल पूछने के बजाय विपक्ष को घेरने में अधिक सक्रिय दिखाई देते हैं।
हालिया शिक्षा संबंधी विवाद ने इस बहस को और तेज कर दिया। लाखों छात्रों और डिजिटल शिक्षा मंचों से जुड़े लोगों ने इसे केवल एक टिप्पणी का मामला नहीं माना, बल्कि इसे उस मानसिकता का प्रतीक बताया जिसमें जमीनी मुद्दों से अधिक महत्व टीवी बहसों को दिया जाता है।
सरकार को भी हो सकता है नुकसान
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी सरकार के लिए सबसे उपयोगी मीडिया वह होता है जो उसकी उपलब्धियों को दिखाने के साथ-साथ कमियों की ओर भी ईमानदारी से ध्यान दिलाए। जब जनता को यह महसूस होने लगता है कि मीडिया का एक वर्ग केवल बचाव की भूमिका निभा रहा है, तब उसका असंतोष केवल मीडिया तक सीमित नहीं रहता बल्कि सरकार तक भी पहुँचता है।
यही कारण है कि कई बार सरकार के समर्थक माने जाने वाले कुछ मीडिया चेहरों की कार्यशैली अंततः सरकार की छवि के लिए भी चुनौती बन सकती है। जनता सवाल पूछने वाले पत्रकार को सम्मान देती है, लेकिन पक्षकार बनते दिखने वाले पत्रकार पर संदेह करने लगती है।
डिजिटल युग में बदल गया समीकरण
आज सूचना का स्रोत केवल टीवी चैनल नहीं हैं। यूट्यूब, सोशल मीडिया और स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म लाखों लोगों तक सीधे पहुँच रहे हैं। ऐसे माहौल में यदि मुख्यधारा मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं तो उसका लाभ वैकल्पिक मंचों को मिलता है।
यही वजह है कि अब पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी टीआरपी नहीं बल्कि भरोसा बन चुकी है।
लोकतंत्र के लिए चेतावनी
पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता का विरोध करना नहीं, बल्कि सत्ता से जवाबदेही सुनिश्चित करना है। उसी प्रकार पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता का बचाव करना भी नहीं है। जब मीडिया किसी एक छवि में बंध जाता है तो उसकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है और लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होता है।
निष्कर्ष
देश में प्रेस की स्वतंत्रता, मीडिया की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक संवाद को मजबूत करने के लिए आवश्यक है कि पत्रकारिता तथ्यों, संतुलन और जवाबदेही के सिद्धांतों पर कायम रहे। किसी भी सरकार की सबसे बड़ी ताकत आलोचना से बचना नहीं, बल्कि आलोचना सुनकर स्वयं को बेहतर बनाना होती है। और किसी भी पत्रकार की सबसे बड़ी पहचान सत्ता के निकट होना नहीं, बल्कि जनता के विश्वास के योग्य बने रहना है।
शौर्यपथ विशेष रिपोर्ट
ब्रिटेन को दुनिया की सबसे मजबूत बैंकिंग और सुरक्षा व्यवस्थाओं वाले देशों में गिना जाता है, लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज कुछ ऐसी डकैतियां भी हैं जिन्होंने इस दावे को चुनौती दी। करोड़ों पाउंड की नकदी, सोना और वित्तीय दस्तावेज लूटने वाली इन घटनाओं ने न केवल ब्रिटेन की सुरक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया, बल्कि अपराध की दुनिया में भी नए अध्याय लिख दिए।
इनमें से कुछ डकैतियां इतनी बड़ी थीं कि आज भी उन्हें अपराध जगत की सबसे साहसिक और चर्चित घटनाओं में गिना जाता है।
सिटी बॉन्ड्स डकैती (1990): इतिहास की सबसे बड़ी वित्तीय लूट
2 मई 1990 को लंदन की एक व्यस्त सड़क पर हुई घटना ने पूरे वित्तीय जगत को स्तब्ध कर दिया। कूरियर एजेंट जॉन गोडार्ड से एक लुटेरे ने चाकू की नोक पर उसका ब्रीफकेस छीन लिया।
यह कोई साधारण ब्रीफकेस नहीं था। इसमें बैंक ऑफ इंग्लैंड के 301 बियरर बॉन्ड्स और ट्रेजरी बिल रखे थे, जिनकी कुल कीमत 291.9 मिलियन पाउंड आंकी गई। वर्तमान मूल्य के अनुसार यह राशि लगभग 720 मिलियन पाउंड के बराबर मानी जाती है।
यह डकैती आज भी ब्रिटेन के इतिहास की सबसे बड़ी डकैती और दुनिया की सबसे बड़ी एकल सड़क लूट की घटनाओं में शामिल है।
सिक्यूरिटास डिपो डकैती (2006): नकदी की सबसे बड़ी चोरी
फरवरी 2006 में दक्षिण-पूर्वी इंग्लैंड के टोनब्रिज स्थित सिक्यूरिटास डिपो पर अपराधियों ने बेहद सुनियोजित हमला किया।
लुटेरों ने पहले डिपो के प्रबंधक और उसके परिवार को बंधक बनाया। इसके बाद वे सुरक्षा केंद्र के भीतर प्रवेश करने में सफल रहे और नोटों से भरी बोरियां लेकर फरार हो गए।
इस डकैती में करीब 53 मिलियन पाउंड नकद लूटे गए, जो ब्रिटेन के इतिहास की सबसे बड़ी नकदी डकैती मानी जाती है।
हालांकि बाद में पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया, लेकिन पूरी राशि कभी बरामद नहीं हो सकी।
ब्रिंक्स-मैट डकैती (1983): जब लुटेरों के हाथ लगा 3 टन सोना
26 नवंबर 1983 को हीथ्रो हवाई अड्डे के निकट स्थित ब्रिंक्स-मैट गोदाम पर कुछ अपराधियों ने एक सुरक्षा गार्ड की मिलीभगत से धावा बोला।
लुटेरों को उम्मीद थी कि उन्हें केवल नकदी मिलेगी, लेकिन उनके सामने सोने का खजाना खुल गया।
डकैत लगभग 3 टन वजन की 6,800 सोने की छड़ों और हीरों के साथ फरार हो गए। उस समय इसकी कीमत लगभग 26 मिलियन पाउंड आंकी गई थी।
यह घटना ब्रिटेन के इतिहास की सबसे बड़ी स्वर्ण डकैती के रूप में दर्ज है और आज भी अपराध विज्ञान के छात्रों के लिए अध्ययन का विषय बनी हुई है।
द ग्रेट ट्रेन रॉबरी (1963): 15 मिनट में इतिहास रचने वाली डकैती
8 अगस्त 1963 की रात ब्रिटेन के अपराध इतिहास की सबसे चर्चित रातों में से एक बन गई।
15 अपराधियों के एक गिरोह ने ग्लासगो से लंदन जा रही रॉयल मेल ट्रेन के सिग्नल सिस्टम के साथ छेड़छाड़ कर ट्रेन को रोक दिया।
मास्टरमाइंड ब्रूस रेनॉल्ड्स के नेतृत्व में गिरोह ने महज 15 मिनट के भीतर इंजन और हाई-वैल्यू कोच को अलग किया और नोटों से भरे 120 बैग लेकर फरार हो गया।
डकैतों ने लगभग 2.6 मिलियन पाउंड लूटे, जिसकी वर्तमान कीमत 53 मिलियन पाउंड से अधिक आंकी जाती है।
यह डकैती केवल चोरी की रकम के कारण नहीं, बल्कि उसकी योजना, निष्पादन और बाद की पुलिस जांच के कारण भी विश्वभर में प्रसिद्ध हुई।
अपराध से सुरक्षा सुधार तक
इन सभी घटनाओं में एक समानता थी—अत्यंत सुनियोजित योजना, सुरक्षा तंत्र की कमजोरियों का फायदा और अंदरूनी सूचनाओं का उपयोग।
इन डकैतियों के बाद ब्रिटेन में बैंकिंग सुरक्षा, नकदी परिवहन, स्वर्ण भंडारण और उच्च मूल्य के वित्तीय दस्तावेजों की सुरक्षा संबंधी नियमों में व्यापक बदलाव किए गए।
अत्याधुनिक निगरानी प्रणाली, कड़े सत्यापन मानक, बेहतर सुरक्षा प्रशिक्षण और आधुनिक ट्रैकिंग तकनीकों को लागू किया गया ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
इतिहास का सबक
ब्रिटेन की ये चार डकैतियां केवल अपराध की घटनाएं नहीं थीं, बल्कि उन्होंने यह साबित किया कि दुनिया की सबसे मजबूत सुरक्षा व्यवस्था भी तब कमजोर पड़ सकती है जब अपराधी योजना, धैर्य और अंदरूनी जानकारी के साथ हमला करें।
इन घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों को एक महत्वपूर्ण सबक दिया—सुरक्षा केवल ताले, हथियार और कैमरों से नहीं, बल्कि सतत निगरानी, जवाबदेही और तकनीकी सतर्कता से सुनिश्चित होती है।
आज भी सिटी बॉन्ड्स डकैती, सिक्यूरिटास डिपो लूट, ब्रिंक्स-मैट स्वर्ण चोरी और ग्रेट ट्रेन रॉबरी अपराध इतिहास के ऐसे अध्याय हैं, जिन्हें दुनिया कभी भूल नहीं पाएगी।
विशेष लेख | शौर्यपथ
13 दिसंबर 2009 की सुबह पाकिस्तान के आर्थिक केंद्र कराची में हुई एक ऐसी घटना ने पूरे बैंकिंग तंत्र को झकझोर दिया, जिसे आज भी देश के इतिहास की सबसे बड़ी और सबसे संगठित बैंक डकैतियों में गिना जाता है। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी वास्तविक घटना थी जिसमें बैंक की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाला व्यक्ति ही करोड़ों की लूट का मास्टरमाइंड निकला।
कराची स्थित Allied Bank Limited की मुख्य शाखा में हुई इस डकैती ने न केवल सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि किसी भी संस्थान के लिए सबसे बड़ा खतरा कई बार बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से होता है।
31 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा पर हाथ साफ
रविवार की सुबह बैंक बंद था। इसी अवसर का फायदा उठाते हुए सुरक्षा एजेंसी SPS में तैनात गार्ड शाहिद महमूद के नाम से कार्यरत व्यक्ति अपने 4-5 साथियों के साथ बैंक परिसर में पहुंचा। बैंक में पहले से मौजूद सुरक्षाकर्मियों और चौकीदारों को हथियारों के बल पर बंधक बना लिया गया।
इसके बाद लुटेरों ने गैस कटर की मदद से बैंक के स्ट्रॉन्ग रूम में स्थित उस लॉकर को निशाना बनाया, जिसमें विदेशी मुद्रा रखी गई थी। लगभग तीन घंटे तक चले इस ऑपरेशन में गिरोह करीब 31 करोड़ पाकिस्तानी रुपये मूल्य की विदेशी मुद्रा और नकदी लेकर फरार हो गया।
लूटी गई रकम में ब्रिटिश पाउंड, यूरो, अमेरिकी डॉलर और पाकिस्तानी मुद्रा शामिल थी। बिना गोली चले और बिना किसी बड़े संघर्ष के इतनी बड़ी रकम का गायब हो जाना पाकिस्तान के बैंकिंग इतिहास की सबसे सनसनीखेज घटनाओं में दर्ज हो गया।
जांच में खुला सबसे बड़ा राज
पुलिस जांच में सामने आया कि कथित सुरक्षा गार्ड का असली नाम हामिद अली था। उसने नौकरी पाने के लिए एक गुमशुदा व्यक्ति के राष्ट्रीय पहचान पत्र (CNIC) का इस्तेमाल कर अपनी पहचान छिपाई थी।
यही नहीं, उसे बैंक की सुरक्षा व्यवस्था, स्ट्रॉन्ग रूम की संरचना और विदेशी मुद्रा रखने वाले लॉकर की पूरी जानकारी थी। यही जानकारी इस डकैती की सफलता का सबसे बड़ा कारण बनी।
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि बैंक में मौजूद एक अन्य गार्ड इमरान ने भी मौके का फायदा उठाकर लूट की रकम का एक हिस्सा अपने पास छिपा लिया था और पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की थी। बाद में उसे भी सह-आरोपी बनाया गया।
सिर्फ 6 दिन में पुलिस की बड़ी सफलता
कराची पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन यूनिट (SIU) ने तेजी से कार्रवाई करते हुए डकैती के महज छह दिन बाद मुख्य आरोपी हामिद अली और उसके सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया।
छापेमारी के दौरान पुलिस ने लूटी गई रकम का लगभग 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा बरामद कर लिया। हालांकि पूरी राशि कभी बरामद नहीं हो सकी और शेष रकम की तलाश में पुलिस ने विभिन्न प्रांतों में अभियान चलाया।
अदालत ने दिखाई सख्ती
मामले की सुनवाई आतंकवाद विरोधी अदालत (ATC) और बाद में उच्च न्यायिक मंचों पर हुई। मुख्य सरगना हामिद अली और उसके सहयोगियों को दोषी ठहराते हुए कठोर कारावास और भारी जुर्माने की सजा सुनाई गई। अदालतों ने आरोपियों की जमानत याचिकाओं को भी लगातार खारिज किया।
यह फैसला इस संदेश के रूप में देखा गया कि वित्तीय संस्थानों की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वालों के प्रति न्यायपालिका किसी प्रकार की नरमी नहीं बरतेगी।
एक डकैती जिसने बदल दिए पूरे सिस्टम के नियम
इस घटना ने पाकिस्तान की बैंकिंग और निजी सुरक्षा व्यवस्था की कई गंभीर खामियों को उजागर कर दिया। परिणामस्वरूप सरकार, पुलिस प्रशासन और स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान को व्यापक सुधारात्मक कदम उठाने पड़े।
सुरक्षा एजेंसी पर कार्रवाई
लापरवाही और बिना पर्याप्त सत्यापन के गार्ड नियुक्त करने के आरोप में SPS सुरक्षा एजेंसी का लाइसेंस निलंबित कर दिया गया और उसके कार्यालय को सील कर दिया गया।
गार्डों का अनिवार्य सत्यापन
पूरे सिंध प्रांत में कार्यरत 60 हजार से अधिक निजी सुरक्षा गार्डों का बायोमेट्रिक और पुलिस सत्यापन शुरू किया गया। बैंकों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि बिना सरकारी अनुमति और जांच के किसी गार्ड की नियुक्ति नहीं की जाएगी।
CCTV व्यवस्था का आधुनिकीकरण
जांच में पता चला कि बैंक के सीसीटीवी कैमरों की गुणवत्ता इतनी कमजोर थी कि संदिग्धों की पहचान करना मुश्किल हो रहा था। इसके बाद सभी बैंकों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले HD कैमरे, सुरक्षित डेटा बैकअप और आधुनिक निगरानी प्रणाली अनिवार्य कर दी गई।
सुरक्षा ऑडिट और जवाबदेही
बैंकों को नियमित सुरक्षा ऑडिट, थर्ड पार्टी मूल्यांकन और आपातकालीन परिस्थितियों में तय मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का पालन करने के निर्देश दिए गए। बैंक प्रबंधन की जवाबदेही भी पहले की तुलना में कहीं अधिक कठोर कर दी गई।
इतिहास का सबक
कराची की यह ऐतिहासिक बैंक डकैती केवल करोड़ों रुपये की चोरी की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा उदाहरण है जिसने यह साबित किया कि सुरक्षा व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी अक्सर वही व्यक्ति हो सकता है जिस पर सबसे अधिक भरोसा किया जाता है।
2009 की इस घटना ने पाकिस्तान के बैंकिंग क्षेत्र को एक कठोर सबक दिया—सुरक्षा केवल हथियारों, ताले और कैमरों से नहीं आती, बल्कि सही सत्यापन, पारदर्शिता और जवाबदेही से सुनिश्चित होती है।
आज भी जब बैंकिंग सुरक्षा की चर्चा होती है, तो कराची की यह डकैती एक चेतावनी के रूप में याद की जाती है कि एक अंदरूनी साजिश किस तरह पूरे सुरक्षा तंत्र को ध्वस्त कर सकती है और करोड़ों की संपत्ति को कुछ घंटों में गायब कर सकती है।
शौर्यपथ लेख /
माँ... मैं एक माँ हूँ। कैसे कह सकती हूँ कि मुझे कुछ चाहिए?
क्यों मुझे कभी कुछ नहीं चाहिए होता... सिर्फ बच्चों की खुशी के अलावा?
दर्द, भूख, प्यास मुझे भी तो लगती है। स्त्री घर की धुरी है, तो उसकी महत्ता अपेक्षित क्यों? मुझे कहते हुए डर क्यों लगता है कि माँ को भी कभी कुछ चाहिए होता है? ये कहते ही अपराधबोध और हीनता मुझमें कहाँ से आई? ये डर किसने और कब भरा मुझमें?
क्या सच में माँ को कुछ नहीं चाहिए होता?
प्रकृति जन्म देती है, तो स्त्री भी जन्म देती है। पर प्रकृति तो छीन भी लेती है... और माँ से माँगने तक का अधिकार छीन लिया गया। उसे समर्पण, त्याग की मूरत बनाकर देवी बना दिया गया। फिर देवी कुछ माँग कैसे सकती है? वो इंसान जो बन जाएगी।
इस डर को 'गिल्ट' बनाकर समाज ने स्त्री के जेहन में गहराई से भर दिया।
माँ अपना अस्तित्व भूल गई और सिर्फ 'माँ' बनकर रह गई। उसे समझा दिया गया कि जिस दिन वह अपने लिए सोचेगी, उस दिन स्वार्थी कहलाएगी। माँ को इतने ऊँचे पद पर बैठा दिया गया जहाँ से वह खुद को देख ही नहीं पाती।
माँ एक जिम्मेदारी है... इस संसार को सही सोच देने की। माँ सिर्फ एक शब्द नहीं... सोच है। माँ के कर्तव्य के साथ अधिकार होते हैं, ये सिखाने की जिम्मेदारी भी तो माँ की ही है। फिर 'अधिकार' कहते ही गिल्ट क्यों?
त्याग, समर्पण, ममता, स्त्रीत्व से सीमित नहीं... उसकी एक असीमित दुनिया होती है। उसकी असीमितता का बोध किसने छीन लिया उससे? इन बातों का कभी उत्तर ही नहीं मिला।
खुद को लुटाते-लुटाते वो ममता से खाली नहीं होती, पर तड़पती रहती है प्यार और अपनेपन के लिए। उसके पास इतना खजाना कहाँ से आता है जो कभी खत्म ही नहीं होता? और ना कभी थकती है वो... लुटाते-लुटाते।
माँ ऐसी क्यों होती है... पूरी दुनिया से अलग?
क्योंकि ममता साँस होती है, और साँस लेने से कोई थकता नहीं। दुनिया से अलग इसलिए है क्योंकि दुनिया हिसाब माँगती है... और माँ बेहिसाब है। क्योंकि जिस दिन वो माँ बनती है, उस दिन से वो सिर्फ 'माँ' ही बचती है।
माँ के प्यार पर कभी जिरह नहीं होती... क्योंकि माँ हर स्पंदन का सबूत होती है। माँ पर बुरा लिखना... किसी कलम के बस की बात नहीं।
माँ इंसान है... तो उसमें इतनी हिम्मत कहाँ से आती है?
और भगवान है... तो वो रोती क्यों है?
वो क्यों कभी खुद के लिए जीना नहीं चाहती? क्यों अपनी खुशियों को त्यागती रहती है? एक माँ में हीन भावना किसने भरी? किस कूटनीति के तहत भरी? हर व्यक्ति का दिल इसका गवाह और उत्तर दोनों है। और फिर माँ को किसी के साक्ष्य की जरूरत क्या?
समाज ने बेटी को परिस्थिति के साथ चलना सिखाया, बहू को घर जोड़ने की सलाह दी, और माँ को ममता की मूरत बनाकर कहा... "तेरे पास तो खजाना है, तुझे क्या चाहिए? तेरी खुशी तो बच्चों की खुशी में है।" और उससे माँगने का हक छीन लिया।
माँ ने भी अपने सपने बुनना छोड़ दिया। ख्वाब दफन कर, ममता ही लुटाती रह गई। माँ से कहा... "तू भगवान है... तू रोटी देगी।" उसकी पूजा करने लगे... वो रोटी खिलाने लगी और उसने खुद को इंसान समझना छोड़ दिया।
माँ की आजादी को छीन, एक सोने के पिंजरे में कैद कर दिया।
देवी बनाकर कहा... "देखो माँ कितनी महान होती है, कभी कुछ नहीं माँगती।" किसी का ध्यान नहीं गया कि माँ इंसान है... और इंसान थकता है, उसकी जरूरतें होती हैं।
समाज ने एक जाल बिछाया है अपने बोनेपन का। माँ को इतना ऊँचा बिठाया कि वो नीचे उतर कर अपना हक ही ना माँग ले। माँ चुप हो गई... क्योंकि उसे लगा कि उसने कुछ माँगा तो वह देवी से गिरकर 'औरत' हो जाएगी।
माँ होना मतलब... गंगा होना। माँ होना मतलब... सिर्फ देना।
दुनिया ने उसकी थकान का हिसाब रखना बंद कर दिया, क्योंकि माँ तो... बेहिसाब है ना! फिर माँ ने माँगना छोड़ दिया। उसे लगा कि यदि वह एक पल अपने लिए निकाल लेगी, या कहीं किसी से कुछ माँग लेगी, तो उसकी ममता पर उँगलियाँ उठ जाएँगी।
माँ को वही चाहिए होता है, जिसे हम माँ से छीन लेते हैं।
बीबीमैं एक माँ हूँ, इसलिए कह सकती हूँ कि... माँ को भी भूख लगती है, थकान होती है, नींद आती है। उसके भी सपने होते हैं, जो बच्चे होने के बाद दफन हो जाते हैं। माँ का ध्यान सिर्फ बच्चे पर रहता है, क्योंकि उसे सिखाया गया है कि वो भगवान है, इंसान नहीं।
पर माँ इंसान है... भगवान नहीं।
मैं उसे इंसान का दर्जा वापस दिलाना चाहती हूँ, जो उससे छीन लिया गया है। इंसान कहलाना माँ का अपमान नहीं... उसका सम्मान है। माँ को महान नहीं... माँ को इंसान कहो।
आज जब मेरी बेटियाँ माँ बनने वाली हैं, तो मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटियाँ खुद को भूलें। वो कर्तव्य के साथ माँगने का अधिकार रखें, और माँगते समय खुद को स्वार्थी ना समझें। क्योंकि जो माँ खुद से प्यार करती है, वह अपने बच्चों को प्यार करना भी सिखाती है।
वो सिखाएगी कि... "माँगूंगी तो माँ नहीं रहूंगी"... इस तरह से उसे जज ना किया जाए। उसे महसूस किया जाए, उसके जज्बात का ख्याल रखा जाए। ऐसा करते समय वो 'माँ' ही रहेगी, ये भरोसा दिलाया जाए।
मैं एक माँ हूँ और माँ के लिए आवाज़ उठा रही हूँ। 'माँ को कुछ नहीं चाहिए'... ये अंतःकरण में बैठा दिया गया है, उसे शुद्ध करने की जरूरत है। ये माँ को बताने की जरूरत है कि कुछ न माँगना उसका नेचर नहीं, एक साजिश है।
;;जो कई हाथों से अपनी गृहस्थी संभाल लेती है, एक जीवन को जन्म दे सकती है, वो इतनी कमजोर नहीं हो सकती कि अपने लिए जीने से अपराधबोध में चली जाए। ये उसका नहीं... समाज द्वारा माँ के मन में भरा गया गिल्ट है।
माँ से सिर्फ 'देना' मत सीखो, माँ को 'देना' भी सीखो।
माँ से उससे माँगने का डर छीन लो। उसे बताओ कि तू माँगेगी, तब भी सबसे पवित्र रहेगी। उसे बताओ कि माँगना इंसान होने का सबूत है, कमजोर होने का नहीं।
माँ अपने बच्चों के लिए पूरा आसमान होती है और पूरी ज़मीन भी। उसका किरदार बहुत वृहद है। बात एक माँ की छवि से आजादी की नहीं... माँ को आजाद करने की है, उस गिल्ट से जो उसे कुछ माँगने से रोकता है।
रोटी ना बनाए तो उसकी इज्जत कम नहीं होगी। उसे इतना अपनापन मिले कि उससे कह सकें... "सिर्फ खाना बनाना ही आपका काम नहीं।" और उसे अपने सपने दफन करने की जरूरत नहीं।
हाँ, तू भी थकती है... ये हम जानते हैं। बस इतनी सी परवाह... कि माँ बेपरवाह नहीं होती। क्योंकि माँ के हिसाब और प्रवाह का कोई समकक्ष नहीं।
लेखिका.. डॉक्टर अनुराधा बक्शी "अनु" अधिवक्ता
पोलसाय पारा गली नंबर 1
दुर्ग छत्तीसगढ़
491 001
मो. नं. 91792 80257
शौर्यापथ लेख
आज का इंसान दुनिया की सबसे तेज़ दौड़ में शामिल है। कोई दौलत के पीछे भाग रहा है, कोई शोहरत के पीछे, कोई सत्ता और पहचान की तलाश में भटक रहा है। लेकिन इस अंधी दौड़ में वह सबसे महत्वपूर्ण चीज़ को पीछे छोड़ देता है — खुद को।
यही कारण है कि जीवन के शोर में आत्मा की आवाज़ दब जाती है और इंसान बाहर की दुनिया जीतते-जीतते भीतर से हार जाता है।
सूफ़ी दर्शन और संत परंपरा सदियों से एक ही बात कहती आई है कि ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता बाहर नहीं, भीतर से होकर जाता है। जब तक मनुष्य स्वयं को नहीं पहचानता, तब तक वह परम सत्य को नहीं पा सकता।
इसी गहरी अनुभूति को मशहूर शायर सदा अम्बालवी ने बेहद खूबसूरती से कहा—
"कैसे मिले ख़ुदा से जो ख़ुद से मिला नहीं"
यह सिर्फ एक शेर नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी का दर्शन है।
क्योंकि जो व्यक्ति अपने मन की परतों से अनजान है, जो अपनी आत्मा की खामोशी को नहीं सुन पाया, वह ईश्वर की आवाज़ कैसे सुन सकेगा?
मनुष्य अक्सर मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और तीर्थों में ईश्वर को तलाशता है, जबकि असली इबादत अपने भीतर झाँकने से शुरू होती है।
जब इंसान अपने अहंकार, लालच, क्रोध और झूठ की धूल हटाकर दिल के आईने को साफ करता है, तब उसे एहसास होता है कि जिसे वह बाहर खोज रहा था, वह तो उसके भीतर ही मौजूद था।
तलाश-ए-अक्स में अपनी, वो उम्र भर भटकता रहा,
मिला सब कुछ जहाँ में, बस खुद से मिलना रह गया।
आज समाज में तनाव, अवसाद और अकेलेपन की सबसे बड़ी वजह यही है कि इंसान ने दुनिया से रिश्ता जोड़ लिया, लेकिन खुद से रिश्ता तोड़ लिया।
मोबाइल, भीड़, सोशल मीडिया और कृत्रिम चमक ने इंसान को इतना व्यस्त कर दिया कि उसे अपने भीतर उतरने का समय ही नहीं मिला।
आध्यात्मिकता का अर्थ संसार छोड़ देना नहीं है, बल्कि संसार के बीच रहकर अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना है।
जब इंसान खुद को समझने लगता है, तब उसे यह भी समझ आने लगता है कि नफरत व्यर्थ है, अहंकार क्षणिक है और प्रेम ही सबसे बड़ा सत्य है।
खुदा को ढूंढने निकले हो और खुद से ही बेगाने हो,
मिलेगा क्या तुम्हें हासिल, जब अपने घर से अनजाने हो।
मन का सबसे पवित्र मंदिर इंसान का हृदय है।
यदि वहाँ प्रेम, करुणा और सच्चाई का दीप जल जाए, तो हर दिशा में ईश्वर दिखाई देने लगता है।
फिर धर्म दीवार नहीं बनता, बल्कि आत्मा को जोड़ने वाला पुल बन जाता है।
दिल के आईने को साफ कर, फिर देख तमाशा,
वही खुदा का घर है, जिसे तू बाहर ढूंढता रहा।
आख़िरकार, जीवन का सबसे बड़ा सत्य यही है कि ईश्वर तक पहुँचने की यात्रा स्वयं तक पहुँचने से शुरू होती है।
जिस दिन इंसान अपने भीतर के अंधेरे को पहचान लेगा, उसी दिन उसे रौशनी का असली अर्थ समझ आएगा।
और शायद तभी वह यह महसूस कर पाएगा कि खुदा कहीं दूर आसमान में नहीं, बल्कि उसकी अपनी आत्मा की गहराइयों में बसता है।
शौर्यपथ विशेष लेख।
पद की गरिमा बनाम व्यक्तिगत संबंध : दुर्ग कांग्रेस के सामने बड़ा सवाल
दुर्ग की राजनीति इन दिनों एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। एक ओर शहर कांग्रेस संगठन वर्षों बाद सक्रियता, ऊर्जा और संगठन विस्तार की दिशा में तेजी से आगे बढ़ता नजर आ रहा है, तो दूसरी ओर उसी संगठन के भीतर पद की गरिमा और अनुशासन को लेकर कई ऐसे दृश्य सामने आ रहे हैं, जो आत्ममंथन की मांग करते हैं।
शहर कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में धीरज बकरीवाल की नियुक्ति के बाद दुर्ग कांग्रेस की कार्यशैली में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई दिया है। लंबे समय तक “रिमोट कंट्रोल” शैली के आरोप झेलने वाले संगठन में अब मैदान में सक्रिय नेतृत्व दिखाई दे रहा है। मंडल स्तर तक बैठकों का विस्तार, युवाओं की भागीदारी, पुराने कार्यकर्ताओं का पुनर्सक्रिय होना और आंदोलनों में बढ़ती भीड़ इस बात का संकेत है कि संगठनात्मक स्तर पर धीरज बकरीवाल लगातार अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं।
18 मई को “शहरी सरकार” के खिलाफ हुए कांग्रेस आंदोलन ने भी यह साबित किया कि दुर्ग कांग्रेस अब केवल औपचारिक राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती। पहले जहां आंदोलनों में गिने-चुने चेहरे नजर आते थे, वहीं अब बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं की उपस्थिति संगठन सृजन की दिशा में सकारात्मक संकेत देती है।
लेकिन इसी आंदोलन के दौरान एक ऐसा दृश्य भी सामने आया जिसने कांग्रेस की अंदरूनी संस्कृति पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए। कई वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा सार्वजनिक रूप से “ए धीरज… ओ धीरज…” जैसे संबोधन इस्तेमाल किए गए। यह संबोधन व्यक्तिगत रिश्तों के स्तर पर सामान्य लग सकता है, लेकिन जब वही व्यक्ति संगठन का अधिकृत शहर अध्यक्ष हो, तब प्रश्न केवल नाम पुकारने का नहीं, बल्कि पद की गरिमा का बन जाता है।
राजनीतिक संगठनों की मजबूती केवल भीड़, नारों या आंदोलनों से तय नहीं होती। किसी भी संगठन की वास्तविक शक्ति उसके अनुशासन, संरचना और पदों के सम्मान से निर्मित होती है। यही वह बिंदु है जहां भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की कार्यशैली में बड़ा अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।
भाजपा में पद पर बैठा व्यक्ति उम्र में छोटा हो या बड़ा, व्यक्तिगत संबंध चाहे जैसे हों, सार्वजनिक मंच पर उसे उसके पद के अनुरूप संबोधित किया जाता है। यही कारण है कि संगठनात्मक अनुशासन भाजपा की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। कार्यकर्ता यह समझता है कि वह केवल व्यक्ति का नहीं, बल्कि संगठनात्मक व्यवस्था का सम्मान कर रहा है।
दुर्ग शहर भाजपा का उदाहरण सामने है। भाजपा जिला अध्यक्ष सुरेंद्र कौशिक के अधीन पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं। शायद ही ऐसा कोई अवसर देखने को मिला हो जब किसी विधायक या वरिष्ठ नेता ने सार्वजनिक रूप से अध्यक्ष पद की गरिमा को कमतर करने वाला व्यवहार किया हो। यही संगठनात्मक संस्कृति भाजपा को बूथ से लेकर सत्ता तक मजबूती प्रदान करती है।
कांग्रेस के भीतर समस्या यह नहीं कि वरिष्ठ नेता धीरज बकरीवाल को व्यक्तिगत रूप से “धीरज” कहकर संबोधित करते हैं। समस्या यह है कि सार्वजनिक मंच पर अध्यक्ष पद की गरिमा को किस नजर से देखा जा रहा है। यदि वरिष्ठ ही पद की औपचारिक मर्यादा का पालन नहीं करेंगे, तो नए कार्यकर्ताओं में संगठनात्मक अनुशासन की भावना कैसे विकसित होगी?
आज कांग्रेस जिस दौर से गुजर रही है, उसमें केवल विचारधारा या विरोध की राजनीति पर्याप्त नहीं है। संगठन को मजबूत करने के लिए आंतरिक अनुशासन, पदों का सम्मान और सामूहिक नेतृत्व की संस्कृति विकसित करना अनिवार्य हो गया है।
यह भी सच है कि धीरज बकरीवाल स्वयं शायद इन संबोधनों पर कोई आपत्ति न रखते हों। संभव है कि वे इसे वरिष्ठों का स्नेह मानते हों। लेकिन राजनीति में कई बार व्यक्ति की व्यक्तिगत सहजता से अधिक महत्वपूर्ण संस्था और पद की गरिमा होती है। अध्यक्ष केवल “धीरज” नहीं रहते, वे उस समय पूरे संगठन का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं।
कांग्रेस को यह समझना होगा कि परिवारवाद, गुटबाजी और “मैं” केंद्रित राजनीति से ऊपर उठे बिना संगठनात्मक पुनर्जीवन संभव नहीं है। यदि भाजपा के संगठनात्मक मॉडल में कुछ सकारात्मक तत्व हैं, तो उन्हें अपनाने में वैचारिक हार नहीं, बल्कि राजनीतिक परिपक्वता दिखाई देती है।
आज जरूरत इस बात की है कि कांग्रेस कार्यकर्ता यह महसूस करें कि संगठन किसी व्यक्ति विशेष का मंच नहीं, बल्कि सामूहिक राजनीतिक व्यवस्था है। जहां पद का सम्मान व्यक्ति से बड़ा होता है।
आंदोलन हजारों हो सकते हैं, भीड़ लाखों की हो सकती है, लेकिन यदि संगठन के भीतर ही पद और जिम्मेदारी का सम्मान कमजोर पड़ जाए, तो राजनीतिक ताकत धीरे-धीरे खोखली होने लगती है।
“ए धीरज… ओ धीरज…” से “अध्यक्ष साहब” तक का यह सफर केवल संबोधन बदलने का नहीं, बल्कि कांग्रेस की संगठनात्मक सोच बदलने का सवाल है। और शायद यही वह परिवर्तन है जिसकी दुर्ग कांग्रेस को आने वाले समय में सबसे अधिक आवश्यकता है।
कभी-कभी कुछ आवाज़ें सिर्फ गीत नहीं गातीं, वे इंसानियत, हौसले और जीवन के सबसे गहरे दर्द को महसूस करा जाती हैं।
असम के तिनसुकिया जिले के रहने वाले 17 वर्षीय युवा गायक ऋषभ दत्ता की आवाज़ भी ऐसी ही थी, जो आज उनके जाने के वर्षों बाद भी लोगों की आंखें नम कर रही है।
इन दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें ऋषभ अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए हाथ में गिटार थामे बेहद शांत और भावुक अंदाज़ में सदाबहार गीत “लग जा गले” और “चन्ना मेरेया” गाते दिखाई दे रहे हैं।
वीडियो में उनके चेहरे पर दर्द साफ दिखाई देता है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा दिखाई देता है — संगीत के प्रति उनका जुनून और जिंदगी से आखिरी पल तक लड़ने का साहस।
ऋषभ दत्ता एक गंभीर और दुर्लभ बीमारी “अप्लास्टिक एनीमिया” (Aplastic Anemia) से पीड़ित थे।
इस बीमारी में शरीर नई रक्त कोशिकाएं बनाना बंद कर देता है, जिससे मरीज की हालत लगातार कमजोर होती चली जाती है।
परिवार ने उन्हें बचाने के लिए हर संभव कोशिश की। बेंगलुरु के एक अस्पताल में उनका महंगा बोन मैरो ट्रांसप्लांट भी कराया गया। डॉक्टरों और परिवार को उम्मीद थी कि ऋषभ फिर से सामान्य जिंदगी जी पाएंगे, लेकिन लंबी लड़ाई के बाद 8 जुलाई 2020 को यह युवा कलाकार जिंदगी की जंग हार गया।
अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान ऋषभ ने डॉक्टरों और नर्सों के सामने गिटार बजाते हुए जो गीत गाए, वही वीडियो आज फिर इंटरनेट पर लोगों को भावुक कर रहा है।
मौत से कुछ कदम दूर खड़ा एक लड़का… लेकिन चेहरे पर शिकन नहीं, बल्कि मुस्कान…
कमजोर शरीर… लेकिन सुरों में वही आत्मविश्वास…
यही दृश्य लाखों लोगों के दिलों को छू रहा है।
सोशल मीडिया पर लोग उन्हें
“रियल फाइटर”,
“म्यूजिक वॉरियर”
और
“हौसले की मिसाल”
बताकर श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
ऋषभ अपनी मधुर आवाज और सादगी की वजह से वर्ष 2019 के अंत में ही इंटरनेट पर लोकप्रिय हो चुके थे। उनके गाए गीतों को हजारों लोगों ने पसंद किया था।
लेकिन किसी ने शायद यह नहीं सोचा था कि इतनी छोटी उम्र में यह प्रतिभाशाली गायक दुनिया को अलविदा कह देगा।
ऋषभ दत्ता अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज आज भी सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंच रही है।
उनका वायरल वीडियो सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि जिंदगी के आखिरी पल तक उम्मीद, साहस और मुस्कान बनाए रखने का संदेश बन चुका है।
जब भी कोई “लग जा गले…” की वह धीमी और कांपती हुई आवाज सुनता है, तो एहसास होता है कि कुछ कलाकार शरीर से चले जाते हैं, लेकिन उनकी आत्मा उनकी कला में हमेशा जिंदा रहती है।
शौर्यपथ लेख / यूक्रेन में जारी युद्ध के खत्म होने के कोई संकेत नहीं दिखने और मध्य-पूर्व के 'न युद्ध, न शांति' के दलदल में फंसे होने के बावजूद, हाल के समय के दूसरे संघर्षों के मुकाबले 'ऑपरेशन सिंदूर' को एक मानक अभियान के तौर पर देखना महत्वपूर्ण है। 'ऑपरेशन सिंदूर' की सबसे खास बातें थीं— सैन्य ताकत का तीव्र और नियंत्रित तरीके से निर्णायक इस्तेमाल, ताकि प्रबंधन करने योग्य संघर्ष-विस्तार में रहते हुए ऐसे रणनीतिक नतीजे हासिल किए जा सकें, जिनकी 'बाहर निकलने की रणनीति' स्पष्ट हो और जो मोदी सरकार के राजनीतिक लक्ष्यों के अनुरूप हों। इस संघर्ष की शुरुआत का उद्देश्य था - पाकिस्तान के भारत-विरोधी आतंकवादी नेटवर्क के गढ़ पर सीधा हमला करना और अगर पाकिस्तान की सेना भारत के शुरुआती आतंकवाद-रोधी हमले का सैन्य जवाब देती है, तो उसे भारी नुकसान पहुंचाना। ये ऐसे बड़े लक्ष्य नहीं थे, जिनके लिए बहुत बड़े पैमाने पर और हर तरफ सैन्य ताकत के इस्तेमाल की ज़रूरत पड़ती। यह एक ज़िम्मेदार ताकत द्वारा, राज्य-प्रायोजित आतंकवाद के बार-बार दोहराए जाने वाले कृत्यों को सज़ा देने के लिए चलाया गया एक सटीक, सक्रिय और संयमित प्रतिरोधी अभियान था।
हालांकि भारत ने 2019 में बालाकोट में आतंकवाद-रोधी अभियानों में आक्रामक हवाई शक्ति के इस्तेमाल का प्रयोग किया था, लेकिन इस बार जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के मुख्यालयों पर—जो क्रमशः बहावलपुर और मुरीदके में स्थित हैं—हमला करने की उसकी तत्परता ने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिए जोखिम उठाने की एक नई प्रवृत्ति और संघर्ष को बढ़ाने की इच्छाशक्ति को उजागर किया। फिर भी, राजनीतिक स्तर पर सोच में पूरी स्पष्टता थी कि एक व्यापक संघर्ष भारत के हित में नहीं है, भले ही पाकिस्तान की सैन्य परिसंपत्तियों को और अधिक नुकसान पहुँचाने का सैन्य प्रलोभन मौजूद था।
समझदारी और संयम, ज़िम्मेदार राज-काज और सैन्य अभियानों के दो ऐसे साथ-साथ चलने वाले पहलू हैं, जिन्हें भारत ने 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान अच्छी तरह प्रदर्शित किया; खासकर इस मामले में कि उसने अपने हमलों के दौरान कोई भी अतिरिक्त नुकसान नहीं होने दिया और सैन्य श्रेष्ठता होने के बावजूद पाकिस्तान के युद्धविराम के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। अब पीछे मुड़कर देखने पर, एक लंबे और बड़े संघर्ष से मिलने वाले फ़ायदे, उसके संभावित आर्थिक और मानवीय नुकसानों के मुकाबले बहुत ही मामूली लगते हैं। चार दिनों के भीतर ही संघर्ष को समाप्त कर देने से जो सैकड़ों करोड़ रुपये की बचत हुई, उसने मध्य-पूर्व में चल रहे मौजूदा संघर्ष के दौरान भारत की आर्थिक सहनीयता में योगदान दिया है। दूसरी ओर, मध्य-पूर्व के संघर्ष में अमेरिका के 27 अरब डॉलर से भी ज़्यादा खर्च हो चुके हैं और इस संघर्ष का कोई अंत भी नज़र नहीं आ रहा है।
भारत के मौजूदा उच्च रक्षा संगठन ने संघर्ष के दौरान अच्छी तरह काम किया। ऑपरेशन के नीति-निर्माण और तैयारी के चरण में 'केंद्रीकृत और निर्देशात्मक नियंत्रण' का एक स्पष्ट मॉडल देखने को मिला; इसके पहले स्तर पर प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और रक्षा मंत्री थे, जबकि दूसरे स्तर पर सीडीएस और तीनों सेना के प्रमुख इसे समर्थन दे रहे थे। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि सेना प्रमुखों और खुफिया एजेंसियों को स्पष्ट और ठोस रणनीतिक परिणाम बताए गए थे, जिसके बाद उन्हें एक व्यावहारिक 'कार्ययोजना’ तैयार करने की जिम्मेदारी दी गयी।
भले ही हज़ारों सालों में युद्ध के स्वरूप में कई बदलाव आए हों, लेकिन कौटिल्य, सुन त्ज़ू, क्लॉज़विट्ज़ और लिडेल हार्ट जैसे प्राचीन और आधुनिक रणनीतिकारों द्वारा बताए गए युद्ध के अधिकांश मूल सिद्धांत समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं। कुल मिलाकर, 'ऑपरेशन सिंदूर' की भारत की सफलता ने तनाव बढ़ाने और प्रतिरोध करने की सीमाओं का विस्तार किया, भारत ऐसा इसलिए कर पाया क्योंकि इसने समय की कसौटी पर खरे उतरे युद्ध के कुछ सिद्धांतों और संकट के समय फ़ैसले लेने के तरीकों का पालन किया। इनमें से, लक्ष्य का चयन और उसे बनाए रखना, शक्ति का केंद्रीकरण, आक्रामक कार्रवाई, अचानक हमला, कमान की एकता, सुरक्षा, सरलता, मनोबल और अनुकूलनशीलता ऐसे सिद्धांत हैं, जिन पर और अधिक विचार-विमर्श की आवश्यकता है।
परिचालन स्तर पर, भारत की उभरती हुई बहु-क्षेत्रीय सैन्य रणनीति के 'तलवार' के रूप में आईएएफ का इस्तेमाल करने का फ़ैसला एक साहसी कदम था, जो आज के दौर के संघर्षों के बदलते स्वरूप को दिखाता है और जिस पर बारीकी से नज़र रखने और विश्लेषण करने की ज़रूरत है। पाकिस्तान की चीन से मिली वायु रक्षा प्रणालियों को चकमा देने और उन्हें जाम करने के बाद, भारत ने 7 मई को पाकिस्तान के अंदरूनी इलाकों में घुसकर हमला किया। इस हमले में पाकिस्तान और पीओजेके में मौजूद 9 अहम आतंकवादी ठिकाने तबाह हो गए, और लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज़्बुल मुजाहिदीन के प्रमुख केंद्र नष्ट हो गए। 10 मई को, कुछ ही घंटों के भीतर, भारत ने अपने हमले का दायरा और बढ़ाया तथा 11 प्रमुख सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया, जिनमें नूर खान एयरबेस, रफ़ीक़ी एयरबेस, मुरीद एयरबेस, सुक्कुर एयरबेस, सियालकोट एयरबेस, पसरूर एयरबेस, चुनियां एयरबेस, सरगोधा एयरबेस, स्कार्दू एयरबेस, भोलारी एयरबेस और जैकोबाबाद एयरबेस शामिल थे। इस कार्रवाई से पाकिस्तान की हवाई और युद्ध संबंधी क्षमताओं को गंभीर नुकसान पहुँचा। आईएएफ की हवाई हमलों की तीव्रता से यह ज़ाहिर हो गया है कि इन हवाई अड्डों, विमानों और वहाँ तैनात हथियार प्रणालियों को पहुँचाया गया नुकसान, 1971 के युद्ध में पश्चिमी मोर्चे पर आईएएफ द्वारा पीएएफ के हवाई अड्डों को पहुँचाए गए कुल नुकसान से कहीं ज़्यादा है। 'ऑपरेशन सिंदूर' ने भारत की एकीकृत हवाई रक्षा प्रणाली की परिपक्वता को भी साबित कर दिया, जो दुश्मन की मिसाइल और ड्रोन-केंद्रित रणनीति का मुक़ाबला करने में सक्षम है। हालाँकि, आईएएफ को भविष्य में, अधिक शक्तिशाली दुश्मनों के ख़िलाफ़ किसी भी सीमित संघर्ष की स्थिति में अपने प्लेटफ़ॉर्म, हथियारों और प्रणालियों का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने के लिए, तेज़ गति से लगातार सीखते रहने की आवश्यकता होगी।
भविष्य के युद्ध-क्षेत्रों में, लंबे समय तक चलने वाले संघर्षों का सामना करने के लिए, ज़्यादा एकीकरण और तालमेल की ज़रूरत होगी। वर्तमान में चल रहे सुधारों और संरचनात्मक पहलों पर शायद फिर से विचार करना पड़े, ताकि एक ऐसा संगठनात्मक ढांचा तैयार किया जा सके जो 'भारत-विशिष्ट' हो और 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान सीखे गए अनुभवों पर आधारित हो। हालांकि, दुनिया भर में चल रहे संघर्षों से कई रणनीतिक और परिचालन संबंधी सबक मिलते हैं, लेकिन भारत को दूसरी जगहों से युद्ध-लड़ाई के मॉडल उठाने और उन्हें अपने रणनीतिक और परिचालन वातावरण पर लागू करने के प्रति सावधान रहना चाहिए। उदाहरण के लिए, हवाई परिचालन में मिसाइल और ड्रोन पर ज़्यादा ज़ोर देने के समर्थकों को अपने विचार पर फिर से सोचना चाहिए। भारत के पश्चिमी और उत्तरी मोर्चों पर जैसा हवाई माहौल है, जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे को कड़ी टक्कर देते हैं, वहाँ सिर्फ़ 'बहु-क्षेत्रीय परिचालन' ही सफल होंगे।
भारत के सशस्त्र बलों ने एक जटिल युद्धक्षेत्र के माहौल में खुद को साबित किया है—भले ही सीमित पैमाने पर —जिसने उन्हें कई तरह के ऑपरेशन चलाने और सरकार द्वारा तय किए गए राष्ट्र के सर्वोत्तम हितों के अनुसार, सही समय पर पीछे हटने का अवसर दिया। भारत के रणनीतिक और राष्ट्रीय डीएनए में अलग-अलग पहलू शामिल हैं, जो 21वीं सदी में अब तक राजनीतिक सोच और रणनीतिक अभिव्यक्तियों के संयोजन के रूप में सामने आए हैं। ज़िम्मेदारी और संयम के साथ सक्रिय प्रतिरोध की नींव पर निर्मित 'संपूर्ण राष्ट्र दृष्टिकोण' की ओर एक स्पष्ट बदलाव देखने को मिला है। 'ऑपरेशन सिंदूर' इसी धीरे-धीरे उभरते डीएनए की अभिव्यक्ति था।
**साभार -एयर वाइस मार्शल (डॉ.) अर्जुन सुब्रमण्यम (सेवानिवृत्त)
(लेखक एक सैन्य इतिहासकार और रणनीतिक विश्लेषक हैं। वे नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय में 'राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में राष्ट्रपति उत्कृष्टता पीठ' के पूर्व अध्यक्ष हैं। वर्तमान में वे कौटिल्य स्कूल ऑफ़ पब्लिक पॉलिसी में सहायक संकाय सदस्य हैं और भारत के सभी युद्ध महाविद्यालयों में अतिथि संकाय के रूप में कार्यरत हैं।)
शौर्यपथ लेख / मन की बात' से राष्ट्रीय क्षितिज तक का सफर- प्रायः सभी प्रकृति प्रेमियों का मानना है कि प्रकृति कभी भी अपना ऋण नहीं भूलती। यदि मनुष्य पूरी ईमानदारी से उसके संरक्षण की ओर एक कदम बढ़ाता है, तो प्रकृति उसे अपनी भव्यता से कई गुना वापस लौटाती है। छत्तीसगढ़ की पावन धरा, जो सदियों से अपनी नैसर्गिक संपदा और सघन वन क्षेत्रों के लिए विख्यात रही है, आज वन्यजीव संरक्षण के एक नए स्वर्णिम युग की ओर बढ़ रही है।
छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में स्थित बारनवापारा वन्यजीव अभ्यारण्य (लगभग 245 वर्ग किमी) में काले हिरणों (ब्लैकबक) का सफलतापूर्वक पुनरुद्धार हुआ है, जहाँ इनकी संख्या अब 200 के करीब पहुँच गई है। 1970 के दशक में विलुप्त हो चुके इन हिरणों को 2018 की पुनरुद्धार योजना और 2026 तक के वैज्ञानिक प्रयासों से वापस लाया गया। हाल ही में देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय कार्यक्रम “मन की बात” में जब बारनवापारा अभ्यारण्य के काले हिरणों की सफल वापसी का उल्लेख किया, तो यह केवल एक राज्य की उपलब्धि नहीं रही, बल्कि भारत के पर्यावरण मानचित्र पर वन्यजीव संरक्षण का एक नया अध्याय बन गई।
विजन भरा नेतृत्व और प्रतिबद्धता- इस गौरवमयी उपलब्धि के सूत्रधार छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय हैं। उन्होंने इस सफलता को राज्य की समृद्ध जैव विविधता और पर्यावरण के प्रति सरकार की अटूट प्रतिबद्धता का प्रतिफल बताया है। मुख्यमंत्री श्री साय का मानना है कि प्रधानमंत्री की सराहना केवल एक प्रशंसा नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के वन विभाग और वहां के स्थानीय समुदायों के कठिन परिश्रम पर लगी राष्ट्रीय मुहर है। मुख्यमंत्री के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ आज विकास और पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के बीच उस दुर्लभ संतुलन को साध रहा है, जिसकी आज पूरे विश्व को आवश्यकता है।
वैज्ञानिक रणनीति: विलुप्ति से पुनर्वास तक- बारनवापारा अभ्यारण्य में काले हिरणों (Blackbucks) का दिखाई देना एक समय दुर्लभ हो गया था। लेकिन वन मंत्री श्री केदार कश्यप के कुशल मार्गदर्शन और प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) श्री अरुण कुमार पाण्डेय के रणनीतिक निर्देशन ने इस असंभव लक्ष्य को वास्तविकता में बदल दिया। फरवरी 2026 का महीना छत्तीसगढ़ के वन इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ, जब विशेषज्ञों की कड़ी निगरानी में 30 काले हिरणों को उनके प्राकृतिक आवास में 'सॉफ्ट रिलीज' पद्धति से मुक्त किया गया। यह प्रक्रिया केवल उन्हें जंगल में छोड़ने तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि वे नए वातावरण में बिना किसी तनाव (Stress-free) के रच-बस सकें। ब्लैकबक कंजर्वेशन सेंटर में बेहतर पोषण और वैज्ञानिक देखभाल से इनकी संख्या में वृद्धि हुई।
प्रशासनिक इच्छाशक्ति और मैदानी संघर्ष- इस महाअभियान के पीछे उन जांबाज अधिकारियों और मैदानी अमले की मेहनत है, जिन्होंने दिन-रात एक कर दिया। मुख्य वन संरक्षक (रायपुर) श्रीमती सतोविशा समाजदार और वनमंडलाधिकारी (बलौदाबाजार) श्री धम्मशील गणवीर के नेतृत्व में फील्ड स्टाफ, जीव वैज्ञानिकों और पशु चिकित्सकों की एक समर्पित टीम ने एक ढाल की तरह काम किया। वर्तमान में इन हिरणों की सुरक्षा के लिए हाई-टेक निगरानी प्रणाली, जीपीएस ट्रैकिंग और नियमित पेट्रोलिंग का उपयोग किया जा रहा है, जो छत्तीसगढ़ वन विभाग की तकनीकी दक्षता का प्रमाण है।
रामपुर ग्रासलैंड:- एक सुरक्षित भविष्य का पालना बारनवापारा अभ्यारण्य का यह मॉडल आज देश के अन्य राज्यों के लिए एक 'केस स्टडी' बन सकता है। यहाँ केवल काले हिरण की प्रजाति का पुनर्वास नहीं हुआ, बल्कि उनके लिए एक संपूर्ण आवास तंत्र विकसित किया गया। रामपुर ग्रासलैंड का वैज्ञानिक प्रबंधन, प्राकृतिक जल स्रोतों का जीर्णोद्धार और घास की स्थानीय प्रजातियों का संवर्धन वे मुख्य कारक हैं, जिन्होंने काले हिरणों को वहां फलने-फूलने के लिए प्रेरित किया। इसके अतिरिक्त, स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी ने मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व की एक अनूठी मिसाल पेश की है। काला हिरण (ब्लैकबक) भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाने वाला एक संकटग्रस्त मृग है। नर काले हिरण का रंग गहरा भूरा से काला होता है, उसके लंबे सर्पिलाकार सींग होते हैं और शरीर का निचला भाग सफेद होता है। मादा काले हिरण हल्के भूरे रंग की होती हैं और सामान्यतः उनके सींग नहीं होते। यह प्रजाति खुले घास के मैदानों में पाई जाती है और दिन के समय सक्रिय रहती है। इसका मुख्य आहार घास और छोटे पौधे होते हैं। इनकी ऊंचाई लगभग 74 से 84 सेंटीमीटर होती है। नर का वजन 20 से 57 किलोग्राम के बीच और मादाओं का 20 से 33 किलोग्राम तक होता है। नर काले हिरण की सर्पिलाकार सींगें, जो लगभग 75 सेंटीमीटर तक लंबी हो सकती हैं, इन्हें आसानी से पहचानने योग्य बनाती हैं।
भविष्य की राह और राष्ट्रीय संदेश- बारनवापारा अभ्यारण्य में गूंजती काले हिरणों की चहल-कदमी और उनकी कुलाचें इस बात का जीवंत साक्ष्य हैं कि यदि इंसान प्रकृति के प्रति अपनी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी समझ ले, तो खोई हुई धरोहर को फिर से लौटाया जा सकता है। यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए एक 'लिविंग लैबोरेटरी' (जीवंत प्रयोगशाला) के रूप में कार्य करेगी, जहाँ वे प्रकृति के साथ तालमेल बिठाना सीख सकेंगी।
मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय का मानना है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की 'मन की बात' ने हमारे नवाचारों को एक वैश्विक मंच प्रदान किया है। छत्तीसगढ़ सरकार पर्यावरण संवर्धन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जोड़कर एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर रही है, जहाँ मनुष्य और वन्यजीव दोनों सुरक्षित हों।आज जब हम बारनवापारा अभ्यारण्य की खुली वादियों में कुलाचें भरते काले हिरणों को देखते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति स्वयं मुस्कुराते हुए छत्तीसगढ़ के इस सराहनीय प्रयास को अपना आशीर्वाद दे रही है। यह छत्तीसगढ़ के गौरव का वह उत्कर्ष है, जिसकी चमक अब पूरे देश को प्रेरित कर रही है।
साभार
धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक
अशोक कुमार चन्द्रवंशी, सहायक जनसंपर्क अधिकारी
✍️ विशेष लेख | विचार विमर्श
डिजिटल क्रांति के इस दौर में, जहां आम नागरिक कुछ सौ रुपये में महीनेभर का अनलिमिटेड कॉल और इंटरनेट डेटा उपयोग कर रहा है, वहीं छत्तीसगढ़ के विधायकों को हर महीने ₹10,000 का टेलीफोन भत्ता दिया जाना एक गंभीर बहस का विषय बन गया है।
? पृष्ठभूमि क्या कहती है?
सितंबर 2022 में हुए संशोधन के बाद विधायकों का कुल मासिक वेतन और भत्ता लगभग ₹1.60 लाख तक पहुंच गया। इसके साथ ही उन्हें ₹10,000 का टेलीफोन भत्ता, ₹55,000 का निर्वाचन क्षेत्र भत्ता और ₹15,000 का चिकित्सा भत्ता भी मिल रहा है।
सरकार का तर्क है कि विधायकों को अपने क्षेत्र की जनता से लगातार संवाद बनाए रखना होता है, जिसके लिए यह भत्ता आवश्यक है।
? डिजिटल युग में सवाल
आज भारत में टेलीकॉम सेवाएं बेहद सस्ती हो चुकी हैं।
Reliance Jio, Airtel और Vi जैसी कंपनियां बेहद कम कीमत में अनलिमिटेड कॉलिंग और डेटा पैक उपलब्ध करा रही हैं।
ऐसे में सवाल उठता है—
? जब आम व्यक्ति ₹300-₹500 में पूरा महीना निकाल सकता है, तो ₹10,000 का भत्ता किस आधार पर तय किया गया है?
⚖️ तर्क और विरोध
समर्थन में तर्क:
विधायक 24×7 जनता के संपर्क में रहते हैं
सैकड़ों कॉल, मीटिंग और प्रशासनिक समन्वय की जरूरत
कई बार निजी और सरकारी संचार अलग-अलग माध्यमों से करना पड़ता है
विरोध में तर्क:
डिजिटल सेवाएं पहले से सस्ती और सुलभ
भत्ता वास्तविक खर्च से कहीं अधिक
सरकारी खर्चों में अनावश्यक बढ़ोतरी
? नैतिक और आर्थिक प्रश्न
यह मुद्दा सिर्फ एक भत्ते का नहीं, बल्कि सरकारी खर्चों की प्राथमिकता का भी है।
जब सरकार अन्य क्षेत्रों में खर्च कम करने के लिए कदम उठा रही है—जैसे मंत्रालय की कैंटीन सब्सिडी खत्म करना—तो ऐसे भत्तों की समीक्षा भी उतनी ही जरूरी हो जाती है।
? निष्कर्ष: सुधार की जरूरत या व्यवस्था की मजबूरी?
यह स्पष्ट है कि विधायकों को संचार के लिए संसाधन चाहिए, लेकिन क्या ₹10,000 प्रति माह की राशि आज के समय में उचित है, या इसे वास्तविक खर्च के आधार पर संशोधित किया जाना चाहिए?
लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग यही कहती है कि हर खर्च—चाहे वह छोटा हो या बड़ा—जनहित के तराजू पर तौला जाना चाहिए।
डबल इंजन की रफ्तार, योजनाओं की बौछार- किसान, आदिवासी, महिला और युवा बने केंद्र में
शौर्यपथ लेख / छत्तीसगढ़ में बीते लगभग ढाई वर्षों में शासन की कार्यशैली को लेकर एक नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश दिखाई देती है। विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने 'सुशासन' को केवल एक नारा नहीं, बल्कि जमीनी क्रियान्वयन का आधार बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। सीमित समयावधि करीब 2 वर्ष 4 माह 17 दिन में ही सरकार ने विकास का जो खाका तैयार किया है, उसे भविष्य की बड़ी तस्वीर के रूप में देखा जा रहा है।
प्रदेश की पहचान ‘धान का कटोरा’ के रूप में रही है, लेकिन इस पहचान को सम्मान देने का काम हालिया नीतिगत निर्णयों में स्पष्ट दिखता है। किसानों से प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान की खरीदी और 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर तय करना केवल आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि अन्नदाताओं के आत्मविश्वास को मजबूत करने की पहल भी है। इसके साथ ही, तेंदूपत्ता संग्राहकों जिन्हें ‘हरा सोना’ से जुड़ा श्रमिक वर्ग कहा जाता है, के लिए पारिश्रमिक दर को 5500 रुपये करना और चरण पादुका वितरण जैसे निर्णयों ने आदिवासी क्षेत्रों में राहत पहुंचाई है।
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही लगभग 18 लाख प्रधानमंत्री आवासों की स्वीकृति देना सरकार की प्राथमिकताओं को दर्शाता है। बेघर और जरूरतमंद परिवारों को छत उपलब्ध कराना सुशासन की पहली सीढ़ी के रूप में देखा गया।राज्य सरकार ने 70 लाख से अधिक विवाहित महिलाओं के खातों में प्रतिमाह 1000 रुपये की सहायता राशि देने की पहल की। यह राशि भले सीमित लगे, लेकिन ग्रामीण और जरूरतमंद परिवारों के लिए यह आर्थिक संबल का काम कर रही है। यह कदम महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक भागीदारी को बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
लंबे समय तक नक्सलवाद से प्रभावित रहे बस्तर क्षेत्र में शांति स्थापित करने की दिशा में केंद्र और राज्य के संयुक्त प्रयासों ने असर दिखाया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री श्री अमित शाह की रणनीति और संकल्प के साथ 31 मार्च 2026 तक नक्सलमुक्ति का लक्ष्य एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। इससे विकास कार्यों को गति मिलने की उम्मीद बढ़ी है।
विष्णु देव साय सरकार ने युवाओं के लिए पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया सुनिश्चित करने के उद्देश्य से 'छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग' से जुड़े मामलों में जांच कराना सरकार के जवाबदेही वाले दृष्टिकोण को दर्शाता है। साथ ही, खेल गतिविधियों विशेषकर बस्तर व सरगुजा ओलंपिक जैसे आयोजनों के माध्यम से स्थानीय प्रतिभाओं को मंच प्रदान किया गया है।
विगत वर्ष आयोजित ‘सुशासन तिहार’ को इस वर्ष भी 1 मई से 10 जून तक आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य योजनाओं की जमीनी हकीकत को परखना, नागरिकों की समस्याओं का त्वरित समाधान करना और प्रशासन को सीधे जनता से जोड़ना है। श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र और राज्य के समन्वय को 'डबल इंजन सरकार' के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। राज्य सरकार का मानना है कि इस समन्वय से विकास योजनाओं को गति मिली है और इसका लाभ प्रदेश के लगभग तीन करोड़ नागरिकों तक पहुंच रहा है।
‘बगिया के विष्णु’ के रूप में पहचाने जाने वाले मुख्यमंत्री साय ने प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों ईब से इंद्रावती तक विकास का जो रोडमैप तैयार किया है, वह समावेशी विकास की अवधारणा को दर्शाता है। लक्ष्य स्पष्ट है, अंतिम छोर के अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाना।
छत्तीसगढ़ में सुशासन की यह यात्रा अभी 'प्रारंभिक चरण' में है, लेकिन दिशा स्पष्ट दिखाई देती है। सरकार की प्राथमिकताओं में किसान, महिला, आदिवासी, युवा और ग्रामीण समाज केंद्र में हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ये नीतियां किस तरह स्थायी बदलाव का रूप लेती हैं, लेकिन फिलहाल इतना तय है कि विकास की यह कहानी गति पकड़ चुकी है।
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(एल.डी.मानिकपुरी, सहायक जनसंपर्क अधिकारी, कोरिया)
साभार - धनंजय राठौर
संयुक्त संचालक जनसंपर्क
रायपुर, /आज के दौर में टिकाऊ खेती की ओर बढ़ना समय की मांग है। रसायनों के बोझ तले दबती मिट्टी को राहत देने के लिए हरी खाद एक बेहतरीन समाधान बनकर उभरी है। यह न केवल फसलों की पैदावार बढ़ाती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जमीन की उर्वरता को भी सुरक्षित रखती है। मिट्टी बचेगी, तो किसान बचेगा और किसान बचेगा, तो देश समृद्ध होगा।
कृषि विभाग द्वारा किसानों को खेती में हरी खाद के उपयोग के लिए प्रेरित किया जा रहा है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और उत्पादन में सुधार लाने में मदद मिल सके। विभाग के अनुसार धान के खेतों में लगातार रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग से मिट्टी में लाभदायक सूक्ष्म जीवों की गतिविधियां कम हो रही हैं और मिट्टी की संरचना भी प्रभावित हो रही है।
क्या है हरी खाद?
हरी खाद वह सहायक फसल है जिसे मुख्य फसल बोने से पहले खेत में उगाया जाता है और फूल आने की अवस्था में ही उसे हल चलाकर मिट्टी में दबा दिया जाता है। ढैंचा, सनई, लोबिया, मूंग और उड़द जैसी फसलें हरी खाद के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं। हरी खाद के तहत कई फसलों का उपयोग किया जाता है जिनमें दलहनी और बिना दलहनी फसलें शामिल होती हैं। हरी खाद के लिए झाड़ियों और पेड़ों की पत्तियों, टहनियों को भी उपयोग में ला सकते हैं, लेकिन इसके लिए विशेष रूप से ढैंचा फसलों का उपयोग किया जाता है। इन फसलों को खेतों में लगाकर भूमि में सुधार किया जाता है।
मिट्टी की सेहत में सुधार
हरी खाद का सबसे बड़ा प्रभाव मिट्टी की भौतिक और रासायनिक संरचना पर पड़ता है। यह मिट्टी में नाइट्रोजन और कार्बनिक पदार्थों (ह्यूमस) की मात्रा को तेजी से बढ़ाती है। हरी खाद मिट्टी को भुरभुरा बनाती है, जिससे हवा का संचार बढ़ता है और पौधों की जड़ें गहराई तक जा पाती हैं। इसके उपयोग से मिट्टी की पानी सोखने की शक्ति बढ़ जाती है, जो सूखे के समय फसलों के लिए जीवन रक्षक साबित होती है।
उत्पादन में वृद्धि और लागत में कमी
जब मिट्टी स्वस्थ होती है, तो उत्पादन का बढ़ना निश्चित है। हरी खाद के प्रयोग से पैदावार में 15 प्रतिशत से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी जा सकती है। यूरिया और अन्य रासायनिक खादों पर निर्भरता कम हो जाती है, जिससे किसान की फसल की लागत घटती है। मित्र कीटों से फसल का संरक्षण करता है। यह जमीन के भीतर लाभकारी सूक्ष्मजीवों और केंचुओं की संख्या बढ़ाने में मदद करती है।
हरी खाद बनाने की सही विधि
क्षेत्र की जलवायु के अनुसार सनई या ढैंचा का चुनाव करें। बुवाई का समय मानसून की शुरुआत (जून-जुलाई) इसके लिए सबसे उपयुक्त है। जब फसल लगभग 40-50 दिन की हो जाए और उसमें फूल आने लगें, तब उसे पाटा लगाकर या रोटावेटर की मदद से मिट्टी में मिला दें। पलटने के बाद 10-15 दिनों तक खेत में नमी बनाए रखें ताकि खाद अच्छी तरह सड़कर मिट्टी का हिस्सा बन जाए।
हरी खाद के प्रयोग से बढ़ेगी आय
हरी खाद केवल एक उर्वरक नहीं है, बल्कि यह मिट्टी का उपचार है। यदि किसान हर दूसरे या तीसरे साल अपने खेत में हरी खाद का प्रयोग करें, तो न केवल उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि हम समाज को रसायनों से मुक्त, शुद्ध और पौष्टिक अनाज भी उपलब्ध करा पाएंगे।
कृषि के लिए एक वरदान हरी खाद
हरी खाद का उपयोग कृषि के लिए एक ष्वरदानष् के समान है। वर्तमान समय में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो रही है, ऐसे में हरी खाद (ळतममद डंदनतम) प्राकृतिक तरीके से मिट्टी को पुनर्जीवित करने का सबसे सुलभ विकल्प है।
कृषि विभाग द्वारा खरीफ फसल से पूर्व हरी खाद के बीज उपलब्ध कराने की भी पहल की जा रही है। इसके लिए क्षेत्रीय ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों के माध्यम से किसानों से मांग लेकर बीज उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है।
शौर्यपथ लेख।
मुंबई की फिजाओं में जब अंडरवर्ल्ड और गैंगवार का शोर था, उस दौर में एक शख्स ऐसा भी था जिसकी ताकत न बंदूक थी और न बम। उसकी ताकत थी—जुबान और भरोसा। कराची से खाली हाथ आए एक शरणार्थी रतन खत्री ने कैसे 'मटका' जैसे अवैध धंधे को एक कॉर्पोरेट साम्राज्य की तरह खड़ा किया, यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है।
?️ कराची से मुंबई: एक बेनाम शरणार्थी का उदय
विभाजन की आग के बीच रतन खत्री मुंबई आए थे। छोटी-मोटी नौकरियों के बाद उन्होंने सट्टे की दुनिया में कदम रखा। लेकिन उन्होंने इस खेल को केवल 'किस्मत' तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे एक सिस्टम बना दिया।
⚖️ खत्री का 'पारदर्शिता' मॉडल: अंधेरे में उजाले का खेल
आमतौर पर जुए के धंधे में धोखाधड़ी आम बात थी, लेकिन खत्री ने इसे बदल दिया।
सार्वजनिक ड्रा: उन्होंने मटके से ताश के पत्तों की पर्चियां निकालने का खेल सबके सामने शुरू किया।
अटूट विश्वास: खत्री का मानना था कि अगर दांव लगाने वाले को खेल पर यकीन होगा, तभी धंधा बढ़ेगा।
नकद भुगतान: उस दौर में जब 1 करोड़ की रकम एक सपना थी, खत्री का रोजाना का टर्नओवर करोड़ों में था और जीतने वाले को उसकी रकम तुरंत मिल जाती थी।
? बॉलीवुड और 'रंगीला' रसूख
रतन खत्री का रसूख केवल सट्टा बाजार तक सीमित नहीं था, बल्कि फिल्मी गलियारों में भी उनकी तूती बोलती थी।
फिल्म प्रेरणा: 1975 की मशहूर फिल्म 'धर्मात्मा' में प्रेम नाथ का 'मटका किंग' वाला किरदार पूरी तरह खत्री से प्रेरित था।
प्रोड्यूसर की भूमिका: उन्होंने ऋषि कपूर की फिल्म 'रंगीला रतन' को प्रोड्यूस किया और उसमें एक छोटी सी भूमिका (कैमियो) भी निभाई।
? साम्राज्य का पतन और 'मटका' का अंत
हर बड़े साम्राज्य का अंत निश्चित होता है। खत्री के साथ भी यही हुआ:
इमरजेंसी का प्रहार: 1975 में आपातकाल के दौरान उन्हें 19 महीने जेल में बिताने पड़े।
गैंगवार और हिंसा: सट्टा बाजार में दाऊद और अन्य गिरोहों की एंट्री से खून-खराबा बढ़ने लगा।
स्वैच्छिक विदाई: अपनी 'साफ-सुथरी' छवि और सिद्धांतों के पक्के खत्री ने इस हिंसा से खुद को अलग कर लिया और 1990 के दशक तक इस धंधे को अलविदा कह दिया।
"रतन खत्री का इतिहास यह सिखाता है कि धंधा चाहे कानूनी हो या गैरकानूनी, अगर नींव 'भरोसे' पर टिकी है, तो आप एक बेताज बादशाह बन सकते हैं।"
? क्या आप इस रोमांच को परदे पर देखना चाहते हैं?
अगर आप रतन खत्री के इस रहस्यमयी और रोमांचक जीवन को और करीब से समझना चाहते हैं, तो नागराज मंजुले की नई वेब सीरीज 'मटका किंग' का इंतजार करें। इसमें वर्सेटाइल एक्टर विजय वर्मा खत्री के किरदार में जान फूंकते नजर आएंगे।
क्या आपको लगता है कि आज के डिजिटल दौर में रतन खत्री जैसा 'भरोसा' संभव है? अपनी राय हमें जरूर बताएं! ?️?
लेख - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (भारत गणराज्य )
शौर्यपथ लेख / आज 11 अप्रैल हम सभी के लिए बहुत विशेष दिन है। आज भारत के महान समाज सुधारकों में से एक और पीढ़ियों को दिशा दिखाने वाले महात्मा ज्योतिराव फुले की जन्म-जयंती है। इस वर्ष यह अवसर और भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके 200वें जयंती वर्ष का शुभारंभ भी हो रहा है।
महान समाज सुधारक महात्मा फुले का जीवन नैतिक साहस, आत्म चिंतन और समाज के हित के लिए अटूट समर्पण का प्रेरक उदाहरण है। महात्मा फुले को केवल उनकी संस्थाओं या आंदोलनों के लिए ही याद नहीं किया जाता, बल्कि उन्होंने लोगों के मन में जो आशा और आत्मविश्वास जगाया, उसका व्यापक प्रभाव हम आज भी महसूस करते हैं। उनके विचार देशवासियों के लिए प्रेरणापुंज हैं।
महात्मा फुले का जन्म 1827 में महाराष्ट्र में एक बहुत साधारण परिवार में हुआ। लेकिन शुरुआती चुनौतियां कभी उनकी शिक्षा, साहस और समाज के प्रति समर्पण को नहीं रोक पाईं। उन्होंने हमेशा यह माना कि चाहे कितनी भी कठिनाइयां क्यों न आएं, इंसान को मेहनत करनी चाहिए, ज्ञान हासिल करना चाहिए और समस्याओं का समाधान करना चाहिए, न कि उन्हें अनदेखा करना चाहिए। बचपन से ही महात्मा फुले बहुत जिज्ञासु थे और अपनी उम्र के अन्य बच्चों की अपेक्षा कहीं अधिक पुस्तकें पढ़ते थे। वो कहते भी थे, “हम जितना ज्यादा सवाल करते हैं, उनसे उतना ही अधिक ज्ञान निकलता है।” साफ है कि बचपन से मिली जिज्ञासा उनकी पूरी यात्रा में बनी रही।
महात्मा फुले के जीवन में शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण मिशन बनी। उनका मानना था कि ज्ञान किसी एक वर्ग की संपत्ति नहीं, बल्कि एक ऐसी शक्ति है, जिसे सभी के साथ साझा किया जाना चाहिए। जब समाज के बड़े हिस्से को शिक्षा से वंचित रखा जाता था, तब उन्होंने लड़कियों और वंचित वर्गों के लिए स्कूल खोले। वे कहते थे, “बच्चों में जो सुधार मां के माध्यम से आता है, वह बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसलिए अगर स्कूल खोले जाएं, तो सबसे पहले लड़कियों के लिए खोले जाएं।” उन्होंने शिक्षा को न्याय और समानता का माध्यम बनाया।
शिक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण हमें आज भी बहुत प्रेरित करता है। पिछले एक दशक में भारत ने युवाओं के लिए रिसर्च और इनोवेशन को बहुत प्राथमिकता दी है। एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने का प्रयास किया गया है, जिसमें युवा सवाल पूछने, नई चीजें सीखने और इनोवेशन के लिए प्रेरित हों। ज्ञान, कौशल और अवसरों में निवेश करके भारत अपने युवाओं को देश की प्रगति का आधारस्तंभ बना रहा है।
अपने शैक्षिक ज्ञान और बौद्धिकता से महात्मा फुले ने कृषि, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों की गहरी जानकारी हासिल की। वे कहते थे कि किसानों और मजदूरों के साथ अन्याय समाज को कमजोर करता है। उन्होंने देखा कि सामाजिक असमानताएं खेतों और गांवों में लोगों के जीवन को कैसे प्रभावित करती हैं। इसलिए उन्होंने गरीबों, वंचितों और कमजोर वर्गों को सम्मान दिलाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के लिए भी हरसंभव प्रयास किए।
महात्मा फुले ने कहा था, “"जोपर्यंत समाजातील सर्वांना समान अधिकार मिळत नाहीत, तोपर्यंत खरे स्वातंत्र्य मिळत नाही” यानी जब तक समाज के सभी लोगों को समान अधिकार नहीं मिलते, तब तक सच्ची आजादी नहीं मिल सकती। इसी विचार को जमीन पर उतारने के लिए उन्होंने कई संस्थाओं की स्थापना की। उनका सत्यशोधक समाज, आधुनिक भारत के सबसे महत्वपूर्ण समाज सुधार आंदोलनों में से एक था। यह आंदोलन सामाजिक सुधार, सामुदायिक सेवा और मानवीय गरिमा को बढ़ावा देने में अग्रणी रहा था। यह महिलाओं, युवाओं और गांवों में रहने वाले लोगों की पुरजोर आवाज बना। यह आंदोलन उनके इस विश्वास को दर्शाता है कि समाज की मजबूती के लिए न्याय, हर व्यक्ति के प्रति सम्मान और सामूहिक प्रगति जरूरी है।
उनका व्यक्तिगत जीवन भी साहस की मिसाल रहा। लगातार लोगों के बीच रहकर काम करने का असर उनके स्वास्थ्य पर भी पड़ा। लेकिन गंभीर बीमारी भी उनके संकल्प को कमजोर नहीं कर सकी। एक गंभीर स्ट्रोक के बाद भी उन्होंने अपना काम और समाज के लिए संघर्ष जारी रखा। उनका शरीर कमजोर हुआ, लेकिन समाज के प्रति उनका समर्पण कभी नहीं डगमगाया। आज भी करोड़ों लोग उनके जीवन के इस पहलू से प्रेरणा लेते हैं।
महात्मा फुले का स्मरण, सावित्रीबाई फुले के सम्मानजनक उल्लेख के बिना अधूरा है। वह स्वयं भारत की महान समाज सुधारकों में से एक थीं। भारत की पहली महिला शिक्षिकाओं में शामिल सावित्रीबाई ने लड़कियों की शिक्षा को आगे बढ़ाने में बेहद अहम भूमिका निभाई। महात्मा फुले के निधन के बाद भी उन्होंने इस कार्य को जारी रखा। 1897 में प्लेग महामारी के दौरान उन्होंने मरीजों की इतनी सेवा की कि वह स्वयं भी इस बीमारी की शिकार हो गईं और उनका निधन हो गया।
भारतभूमि बार-बार ऐसी महान विभूतियों से धन्य होती रही है, जिन्होंने अपने विचार, त्याग और कर्म से समाज को मजबूत बनाया है। उन्होंने बदलाव का इंतजार नहीं किया, बल्कि स्वयं बदलाव का माध्यम बने। सदियों से हमारे देश में समाज सुधार की आवाज उन्हीं लोगों से उठी है, जिन्होंने पीड़ा को भाग्य नहीं माना, बल्कि उसे खत्म करने के प्रयासों में जुटे रहे। महात्मा ज्योतिराव फुले भी ऐसे ही महान व्यक्तित्व थे।
मुझे 2022 में पुणे की अपनी यात्रा याद है, जब मैंने शहर में महात्मा फुले की भव्य प्रतिमा पर उन्हें श्रद्धांजलि दी थी। उनके 200वें जयंती वर्ष की शुरुआत पर हम उनके विचारों को अपनाकर ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं। हमें शिक्षा के प्रति अपने संकल्प को मजबूत करना होगा। अन्याय के प्रति संवेदनशील बनना होगा और यह विश्वास रखना होगा कि समाज अपने प्रयासों से ही खुद को बेहतर बना सकता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि समाज की शक्ति को जनहित और नैतिक मूल्यों से जोड़कर भारत में क्रांतिकारी बदलाव लाए जा सकते हैं। यही कारण है कि आज भी उनके विचार करोड़ों लोगों में नई उम्मीद जगाते हैं। महात्मा ज्योतिराव फुले 200 साल बाद भी केवल इतिहास का नाम नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के मार्गदर्शक बने हुए हैं।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
