August 10, 2026
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    शौर्य की बाते ( सम्पादकीय )

    शौर्य की बाते ( सम्पादकीय ) (229)

    शौर्यपथ लेख :(शरद पंसारी - संपादक शौर्यपथ दैनिक समाचार एवं shouryapathnews.in)
    मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य को देश का सबसे भरोसेमंद निवेश केंद्र (Investment Hub) बनाने के लिए ऐतिहासिक नीतियां लागू की हैं। राज्य ने सुरक्षा और सुशासन के दम पर पुरानी चुनौतियों को पीछे छोड़ दिया है और हाल ही में 8.22 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव (MoUs) हासिल कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है।छत्तीसगढ़ की इस औद्योगिक क्रांति, नई निवेश नीति (2024-2030), और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' के शानदार सफर पर एक विस्तृत एवं संपूर्ण लेख नीचे दिया गया है।
    लाल आतंक से औद्योगिक वैश्विक पहचान तक: बदलते छत्तीसगढ़ की गौरव गाथा
    1. नक्सलवाद से मुक्ति और शांति का नया सवेरा
    एक समय था जब छत्तीसगढ़ का नाम सुनते ही देश-दुनिया के मानस पटल पर नक्सली हिंसा का अक्स उभरता था। लेकिन साय सरकार और केंद्र की डबल-इंजन सरकार की दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है।
    //नक्सल-मुक्त राज्य का संकल्प: बस्तर सहित सुदूर जनजातीय क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के कड़े अभियानों और समानांतर विकास कार्यों (जैसे सड़कें, स्कूल और अस्पताल) के चलते नक्सलवाद अंतिम सांसे ले रहा है।
    //शांति और सुरक्षा का भरोसा: अब बस्तर और आस-पास के क्षेत्र 'रेड कॉरिडोर' से निकलकर कनेक्टिविटी, पर्यटन और उद्योगों के नए हब बन रहे हैं। निवेशकों के लिए सबसे पहली शर्त "सुरक्षित वातावरण" होती है, जिसे साय सरकार ने पूरी तरह सुनिश्चित किया है।
    2. देश का पहला 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस अधिनियम, 2026'
    छत्तीसगढ़ ने हाल ही में 'छत्तीसगढ़ ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (छूट और सुगमता) अधिनियम, 2026' को विधानसभा से पारित कराकर देश में एक नया राष्ट्रीय कीर्तिमान बनाया है। छत्तीसगढ़ देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जिसने उद्योगों के लिए 'जोखिम और विश्वास आधारित' (Risk & Trust-Based) अनुमति प्रणाली लागू की है।

    3. औद्योगिक विकास नीति (2024-2030): समृद्धि का महामार्ग
    1 नवंबर 2024 से लागू हुई राज्य की औद्योगिक विकास नीति 2024-30 का मुख्य विजन छत्तीसगढ़ को 'अमृतकाल: छत्तीसगढ़ विजन @ 2047' के अनुरूप आर्थिक महाशक्ति बनाना है। इस नीति के प्रमुख आकर्षक वित्तीय और प्रशासनिक लाभ निम्नलिखित हैं:
    // वन-क्लिक सिंगल विंडो पोर्टल: राज्य सरकार ने OneClick Single Window System की शुरुआत की है, जिससे जमीन आवंटन, बिजली-पानी कनेक्शन और पर्यावरण मंजूरी (Environmental Clearance) जैसी सभी औपचारिकताएं पूरी तरह डिजिटल और समयबद्ध हो गई हैं।
    // भारी वित्तीय प्रोत्साहन (Subsidies): नए उद्योगों को फिक्स्ड कैपिटल इन्वेस्टमेंट (FCI) सब्सिडी, ब्याज सब्सिडी, और बिजली शुल्क (Electricity Duty) में शत-प्रतिशत तक की छूट दी जा रही है। इसके अलावा नेट SGST प्रतिपूर्ति (Reimbursement) की भी विशेष व्यवस्था है।
    // भविष्य के सेक्टर्स (Thrust Sectors) पर फोकस: छत्तीसगढ़ पारंपरिक खनिज और इस्पात उद्योगों (जैसे देश का 20% लोहा और कोयला भंडार) से आगे बढ़कर अब हाई-टेक क्षेत्रों में कदम रख चुका है। नीति के तहत फार्मास्युटिकल्स, गारमेंट/टेक्सटाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, ग्रीन हाइड्रोजन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोटिक्स जैसे उभरते क्षेत्रों को विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
    // समावेशी विकास: इस नीति में महिला उद्यमियों, आत्मसमर्पित माओवादियों, अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) के उद्यमियों, अग्निवीरों और दिव्यांगजनों के लिए विशेष सब्सिडी पैकेज और औद्योगिक क्षेत्रों में भूमि आरक्षण का प्रावधान किया गया है।
    // स्थानीय रोजगार पर जोर: नीति के तहत उद्योगों में स्थानीय युवाओं को रोजगार देने के लिए कौशल विकास (Skill Development) केंद्रों की स्थापना और रोजगार-लिंक्ड प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं।
    4. नीति आयोग और रेटिंग्स में छत्तीसगढ़ का डंका
    साय सरकार के इन प्रशासनिक और नीतिगत सुधारों का असर अब राष्ट्रीय स्तर पर दिखने लगा है:
    // नियामक सुगमता में नंबर 1: CRISIL और NITI Aayog Index की हालिया रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ को रेगुलेटरी ईज (नियामक सुगमता) और मजबूत संस्थागत माहौल में देश में प्रथम स्थान मिला है।
    // पर्यावरणीय लचीलापन (Environmental Resilience): औद्योगिक विस्तार के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में छत्तीसगढ़ पूरे देश में दूसरे स्थान पर है।सशक्त कार्यबल: राज्य में महिला कार्यबल भागीदारी दर (Female Workforce Participation Rate) 58.1% है, जो देश के बड़े राज्यों के औसत से 41% अधिक है।
    निष्कर्ष: एक नए 'इन्वेस्टमेंट हब' का उदयनक्सलवाद के अंधकार को चीरकर छत्तीसगढ़ आज सुशासन, सुरक्षा और पारदर्शी नीतियों के दम पर देश के अग्रणी औद्योगिक राज्यों की कतार में खड़ा हो चुका है। साय सरकार द्वारा उठाए गए ये कदम न केवल राज्य की जीडीपी (GSDP) को तेजी से बढ़ा रहे हैं, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए लाखों नए रोजगार सृजित कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ की 2024-2030 की निवेश नीति निश्चित रूप से इसे एक आत्मनिर्भर, समृद्ध और विकसित राज्य बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो रही है।

    शौर्यपथ लेख
    नई दिल्ली/रायपुर। भारत की सदियों पुरानी हथकरघा परंपरा आज भी देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पारंपरिक कौशल और रोजगार का महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन भारत सरकार के उपलब्ध आधिकारिक आंकड़े इस क्षेत्र के सामने एक गंभीर चुनौती की ओर भी संकेत करते हैं। वर्ष 2009-10 की तीसरी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना में देश में 43.31 लाख हथकरघा बुनकर एवं संबद्ध श्रमिक दर्ज किए गए थे। इसके बाद उपलब्ध चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना 2019-20 में यह संख्या घटकर 35.22 लाख रह गई। यानी दोनों जनगणनाओं के बीच कुल कार्यबल में 8.09 लाख की कमी, लगभग 18.68 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई।

    भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय ने 2009-10 की तीसरी हथकरघा जनगणना के आधार पर 43.31 लाख बुनकरों एवं संबद्ध श्रमिकों का आंकड़ा संसद और सरकारी दस्तावेजों में दर्ज किया था। वर्ष 2013-14 तथा 2014 के आसपास के मंत्रालय के दस्तावेजों में भी हथकरघा क्षेत्र में 43.31 लाख व्यक्तियों के रोजगार का उल्लेख मिलता है।

    इसके विपरीत, चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना 2019-20 में देशभर में कुल 35.22 लाख हथकरघा कामगार दर्ज किए गए। इनमें 26,73,891 मुख्य बुनकर और 8,48,621 संबद्ध श्रमिक शामिल हैं। वस्त्र मंत्रालय के हालिया आधिकारिक उत्तरों में भी यही आंकड़ा देश के हथकरघा कार्यबल का Census-based आधार बताया गया है।

    इस तुलना से स्पष्ट है कि 2014 के आसपास के 43.31 लाख के मुकाबले चौथी जनगणना के 35.22 लाख कामगारों तक संख्या पहुंचने पर करीब 18.7 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। यह गिरावट केवल बुनकरों की संख्या में नहीं, बल्कि बुनाई से जुड़ी संबद्ध गतिविधियों में काम करने वाले लोगों को मिलाकर कुल हथकरघा कार्यबल में दिखाई देती है।

    लेकिन कहानी केवल गिरावट की नहीं है

    हथकरघा क्षेत्र की तस्वीर का दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। चौथी जनगणना में दर्ज 35.22 लाख कामगारों में 26.74 लाख मुख्य बुनकर और 8.49 लाख संबद्ध श्रमिक हैं। यानी हथकरघा आज भी करोड़ों परिवारों की पारंपरिक आजीविका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 31.45 लाख हथकरघा परिवार इस क्षेत्र से पूर्ण या आंशिक रूप से आजीविका प्राप्त करते हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि हथकरघा क्षेत्र मुख्यतः असंगठित क्षेत्र है और इसमें काम करने वाले लोग पारंपरिक कौशल के आधार पर स्वरोजगार से जुड़े हैं।

    महिलाओं की बड़ी भूमिका

    हथकरघा क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसकी महिला भागीदारी है। चौथी हथकरघा जनगणना के अनुसार कुल हथकरघा कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 72.3 प्रतिशत है। इससे स्पष्ट होता है कि हथकरघा केवल कपड़ा उत्पादन का माध्यम नहीं बल्कि ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और पारंपरिक कौशल का भी महत्वपूर्ण आधार है।

    2014 से 2026 तक का सवाल—क्या संख्या फिर बढ़ रही है?

    यहीं आंकड़ों को लेकर सावधानी जरूरी है। 2026 में उपलब्ध 35.22 लाख को 2026 की वास्तविक कुल संख्या नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह संख्या 2019-20 की चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना से प्राप्त हुई है।

    हालांकि, केंद्र सरकार ने 28 जनवरी 2025 को e-Pehchan पोर्टल शुरू किया है। इसका उद्देश्य चौथी जनगणना में छूट गए लोगों तथा उसके बाद क्षेत्र में जुड़े नए बुनकरों और संबद्ध श्रमिकों का पंजीयन करना है। मंत्रालय के अनुसार इस प्रक्रिया में नए पंजीयन, मौजूदा विवरणों में संशोधन और e-Pehchan कार्ड डाउनलोड की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस प्रक्रिया के कारण जोड़ने, हटाने और विवरण अपडेट करने का काम लगातार चलता रहता है।

    इसलिए नए e-Pehchan कार्ड जारी होना हथकरघा कार्यबल में नई भागीदारी का संकेत जरूर है, लेकिन इसे सीधे 2019-20 के 35.22 लाख में जोड़कर 2026 की कुल संख्या घोषित करना सांख्यिकीय रूप से सही नहीं होगा।

    डिजिटल बाजार से नई संभावनाएं

    हथकरघा क्षेत्र को पारंपरिक बाजारों से निकालकर डिजिटल बाजार से जोड़ने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं। सरकारी Handloom पोर्टल पर e-Pehchan, India Handmade, GeM और India Handloom Brand जैसे डिजिटल एवं विपणन प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं।

    इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि बुनकरों की आय और रोजगार की स्थिरता केवल करघे की संख्या पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उनके उत्पाद को उचित बाजार, बेहतर मूल्य, डिजाइन, ब्रांडिंग और सीधे ग्राहक तक पहुंच मिलने पर भी निर्भर करती है।

    आंकड़ों का सबसे बड़ा संदेश

    सरकारी आंकड़ों की तुलना एक स्पष्ट तस्वीर सामने रखती है—2009-10 में 43.31 लाख से चौथी जनगणना 2019-20 में 35.22 लाख तक हथकरघा बुनकर एवं संबद्ध श्रमिकों की संख्या में 8.09 लाख की कमी आई।

    यह कमी लगभग 18.68 प्रतिशत है। इससे यह सवाल जरूर उठता है कि पारंपरिक हथकरघा व्यवसाय से लोगों के दूर होने के पीछे कम आय, बाजार में प्रतिस्पर्धा, पावरलूम और मशीन आधारित उत्पादन, कच्चे माल की लागत, विपणन की कठिनाइयां और नई पीढ़ी का दूसरे रोजगारों की ओर बढ़ना कितना जिम्मेदार है।

    दिलचस्प बात यह है कि यह गिरावट नई नहीं है। सरकारी रिकॉर्ड में दूसरी हथकरघा जनगणना 1995-96 में 65.50 लाख बुनकर एवं संबद्ध श्रमिक थे, जो तीसरी जनगणना 2009-10 में घटकर 43.31 लाख रह गए थे। सरकार ने उस समय मशीन आधारित मिल और पावरलूम क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा, सहकारी संस्थाओं की कमजोरी, ऋण की कठिन उपलब्धता और विपणन संबंधी समस्याओं को हथकरघा क्षेत्र की गिरावट के प्रमुख कारणों में गिना था।

    इस लिहाज से 43.31 लाख से 35.22 लाख की गिरावट केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारत की पारंपरिक हथकरघा अर्थव्यवस्था के सामने खड़ी दीर्घकालीन चुनौती का संकेत है।

    अब सरकार के सामने चुनौती केवल नए बुनकरों का पंजीयन करने की नहीं, बल्कि मौजूदा बुनकरों को टिकाऊ रोजगार, बेहतर पारिश्रमिक, सस्ता कच्चा माल, आधुनिक डिजाइन, बाजार तक सीधी पहुंच और डिजिटल बिक्री के अवसर उपलब्ध कराने की है।

    यही तय करेगा कि आने वाले वर्षों में भारत का हथकरघा केवल अपनी गौरवशाली परंपरा के रूप में याद किया जाएगा या फिर यह परंपरा नई पीढ़ी के लिए सम्मानजनक और टिकाऊ रोजगार का मजबूत माध्यम भी बन पाएगी

    (विशेष लेख )
    लेखक : शरद पंसारी
    संपादक, शौर्यपथ दैनिक समाचार

      "कोई भी राज्य केवल प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध नहीं बनता, बल्कि उन संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग, निवेशकों के विश्वास, सुशासन और दूरदर्शी नीतियों से आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा तय करता है।"
    इसी सोच को केंद्र में रखकर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार ने "औद्योगिक विकास नीति 2024-30" के माध्यम से प्रदेश के आर्थिक भविष्य की नई रूपरेखा प्रस्तुत की है। यह केवल एक औद्योगिक नीति नहीं, बल्कि "अमृतकाल : छत्तीसगढ़ विजन 2047" की आधारशिला है, जिसका उद्देश्य प्रदेश के प्रत्येक जिले, प्रत्येक विकासखंड और अंतत: प्रत्येक नागरिक तक विकास का लाभ पहुँचाना है।
    पिछले वर्षों में छत्तीसगढ़ को प्राय: केवल खनिज संपदा वाले राज्य के रूप में देखा जाता रहा, लेकिन नई सरकार की सोच इससे कहीं आगे की है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की परिकल्पना स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ केवल खनिज निकालने वाला प्रदेश नहीं रहेगा, बल्कि मूल्य संवर्धन (Value Addition), आधुनिक उद्योग, तकनीकी नवाचार और रोजगार सृजन का राष्ट्रीय केंद्र बनेगा।
    यही सोच इस औद्योगिक नीति के प्रत्येक प्रावधान में दिखाई देती है।

    विकास का नया मॉडल : केवल उद्योग नहीं, समग्र आर्थिक परिवर्तन
    औद्योगिक नीति 2024-30 का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें केवल बड़े उद्योगों की स्थापना पर जोर नहीं दिया गया है, बल्कि उन क्षेत्रों की पहचान करने का प्रयास किया गया है जो आज भी औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े हुए हैं।
    सरकार की मंशा स्पष्ट है कि प्रदेश के प्रत्येक जिले में स्थानीय संसाधनों के आधार पर उद्योग विकसित हों ताकि क्षेत्रीय असंतुलन समाप्त हो और रोजगार के अवसर लोगों के घर के आसपास ही उपलब्ध हों।
    यह सोच केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे पलायन कम होगा, स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

    प्राकृतिक संपदा से आर्थिक शक्ति तक का सफर
    छत्तीसगढ़ देश के उन राज्यों में शामिल है जहाँ प्रकृति ने भरपूर संपदा प्रदान की है।
    लगभग 44 प्रतिशत वन क्षेत्र, विशाल खनिज भंडार, कृषि उत्पादन, लघु वनोपज, औषधीय पौधे, जल संसाधन और भौगोलिक दृष्टि से देश के मध्य में स्थित होना—ये सभी ऐसी विशेषताएँ हैं जिन्हें यदि योजनाबद्ध तरीके से उपयोग में लाया जाए तो प्रदेश राष्ट्रीय औद्योगिक मानचित्र पर अग्रणी स्थान प्राप्त कर सकता है।
    मुख्यमंत्री साय की सरकार ने इसी सोच के अनुरूप नीति तैयार की है कि केवल खनिजों का दोहन न हो बल्कि उनका स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण (Processing) किया जाए, जिससे रोजगार भी यहीं उत्पन्न हो और उद्योगों का लाभ भी प्रदेश को मिले।

    कोर सेक्टर से लेकर हाई-टेक उद्योगों तक व्यापक दृष्टिकोण
    नई औद्योगिक नीति की सबसे बड़ी विशेषता इसकी व्यापकता है।
    सरकार ने केवल पारंपरिक उद्योगों तक स्वयं को सीमित नहीं रखा है बल्कि—
    फार्मास्यूटिकल उद्योग
    टेक्सटाइल
    सूचना प्रौद्योगिकी
    इंजीनियरिंग
    रक्षा उत्पादन
    खाद्य प्रसंस्करण
    कृषि आधारित उद्योग
    वनोपज आधारित उद्योग
    लॉजिस्टिक्स
    सेवा क्षेत्र
    जैसे अनेक क्षेत्रों को समान प्राथमिकता प्रदान की है।
    यह दर्शाता है कि सरकार आने वाले वर्षों की अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप औद्योगिक ढाँचा तैयार करना चाहती है।

    स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार : नीति का सबसे मानवीय पक्ष
    नई औद्योगिक नीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान स्थानीय रोजगार को प्राथमिकता देना है।
    सरकार ने निवेश प्रोत्साहन को स्थानीय रोजगार से जोड़ते हुए यह संदेश दिया है कि औद्योगिक विकास का वास्तविक लाभ प्रदेश के युवाओं तक पहुँचना चाहिए।
    यदि उद्योग आएँ लेकिन स्थानीय लोगों को रोजगार न मिले तो विकास अधूरा माना जाएगा।
    साय सरकार की यह सोच इस नीति को केवल उद्योग केंद्रित नहीं बल्कि जन-केंद्रित औद्योगिक नीति बनाती है।

    ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस : निवेशकों का भरोसा बढ़ाने की ऐतिहासिक पहल
    आज निवेशक केवल कर छूट या भूमि उपलब्धता नहीं देखते।
    वे यह भी देखते हैं कि—
    अनुमति कितनी जल्दी मिलेगी।
    सरकारी प्रक्रियाएँ कितनी सरल हैं।
    पारदर्शिता कितनी है।
    समयबद्ध निर्णय होते हैं या नहीं।
    इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने Ease of Doing Business (EoDB) को नई ऊँचाई देने का प्रयास किया है।
    विभिन्न विभागों की अनुमतियों, सहमतियों, पंजीकरण और स्वीकृतियों को ऑनलाइन, समयबद्ध और सरल बनाना निवेशकों के लिए अत्यंत सकारात्मक संदेश है।
    यह केवल प्रशासनिक सुधार नहीं बल्कि निवेशकों के प्रति सरकार का विश्वास प्रस्ताव है।

    विश्वास की नई पूंजी
    निवेश केवल पूंजी से नहीं आता।
    निवेश का सबसे बड़ा आधार होता है—विश्वास।
    जब सरकार स्पष्ट नीति, पारदर्शी व्यवस्था, समयबद्ध निर्णय और उद्योग-अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराती है तब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का विश्वास स्वत: बढ़ता है।
    मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार की यह नीति उसी विश्वास को मजबूत करने का प्रयास करती दिखाई देती है।

    आगे की दिशा
    यह औद्योगिक नीति केवल वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करने का दस्तावेज नहीं है।
    यह वर्ष 2047 तक विकसित छत्तीसगढ़ की परिकल्पना का प्रारंभिक रोडमैप है।
    यदि नीति का प्रभावी क्रियान्वयन होता है तो आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ केवल खनिज उत्पादक राज्य नहीं बल्कि औद्योगिक उत्पादन, रोजगार, निवेश, निर्यात और आर्थिक आत्मनिर्भरता का नया केंद्र बन सकता है।
    (क्रमश:...)
    अगले भाग में पढि़ए—
    "औद्योगिक विकास नीति 2024-30 में निवेशकों को मिलने वाले प्रोत्साहन, एमएसएमई, लॉजिस्टिक्स, रक्षा उत्पादन, उद्योग विस्तार (Diversification), स्टार्टअप, जिला-विशेष औद्योगिक संभावनाएँ और प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर इनके दूरगामी प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण।"
    — शरद पंसारी
    संपादक, शौर्यपथ दैनिक समाचार

    निलंबन नहीं, जवाबदेही तय करने का समय

    शासकीय विद्यालयों में अनैतिक आचरण के मामलों पर कठोर और पारदर्शी कार्रवाई की अपेक्षा

    — शरद पंसारी

    संपादक, शौर्यपथ दैनिक समाचार पत्र

    शिक्षक केवल एक सरकारी कर्मचारी नहीं होता, बल्कि समाज का वह स्तंभ होता है जिसके कंधों पर आने वाली पीढ़ी के चरित्र, संस्कार और भविष्य की नींव टिकी होती है। इसलिए जब किसी विद्यालय से शिक्षक के कथित अनैतिक आचरण, विद्यालय परिसर में अनुचित व्यवहार, नशे की हालत में ड्यूटी करने अथवा विद्यार्थियों के समक्ष अशोभनीय गतिविधियों के वीडियो और समाचार सामने आते हैं, तो यह केवल किसी एक कर्मचारी का मामला नहीं रह जाता, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर देता है।

    हाल के समय में सोशल मीडिया पर ऐसे अनेक वीडियो और घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने समाज को झकझोर दिया है। यदि किसी मामले में जांच के बाद आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल सेवा नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि उस नैतिक जिम्मेदारी का भी हनन है, जिसे निभाने की शपथ एक शिक्षक लेता है।

    चिंता का विषय केवल घटनाएं नहीं हैं, बल्कि उनके बाद होने वाली कार्रवाई भी है। अधिकांश मामलों में प्रथम दृष्टया निलंबन की कार्रवाई होती है, जिसके बाद विभागीय जांच की लंबी प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। कई बार ऐसे मामलों में वर्षों तक अंतिम निर्णय नहीं हो पाता। इससे समाज में यह संदेश जाता है कि गंभीर आरोपों के बावजूद कठोर दंड की संभावना सीमित है। यदि जांच में गंभीर अनैतिक आचरण सिद्ध हो जाए, तो केवल निलंबन पर्याप्त नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में सेवा नियमों के अनुरूप कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।

    यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि विद्यालय का वातावरण बिगड़ने तक स्थिति पहुंची कैसे? क्या विद्यालय प्रमुख और संबंधित अधिकारी पूरी तरह अनभिज्ञ थे? किसी भी संस्था में अनुशासन बनाए रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी केवल एक कर्मचारी की नहीं, बल्कि नेतृत्व की भी होती है। यदि किसी विद्यालय में लंबे समय से अनुशासनहीनता या गंभीर शिकायतें थीं और समय रहते उनका संज्ञान नहीं लिया गया, तो संबंधित प्रशासनिक स्तर पर भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। हालांकि यह जवाबदेही प्रत्येक मामले के तथ्यों और जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही निर्धारित होनी चाहिए।

    विडंबना यह भी है कि निजी विद्यालयों में छोटी-सी अनियमितता पर भी कठोर प्रशासनिक कदम उठाने की मांग तेज हो जाती है। वहीं शासकीय विद्यालयों में गंभीर आरोपों के मामलों में अक्सर कार्रवाई की गति और कठोरता पर प्रश्न उठते हैं। शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि नियम सभी संस्थानों पर समान रूप से लागू हों। सरकारी और निजी विद्यालयों के लिए अलग-अलग मानदंड लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं माने जा सकते।

    आज अभिभावक अपने बच्चों को विद्यालय इसलिए भेजते हैं कि वहां उन्हें ज्ञान, अनुशासन और संस्कार प्राप्त हों। यदि विद्यालय का वातावरण ही विवादों और अनुचित आचरण का केंद्र बनने लगे, तो इसका सबसे गहरा दुष्प्रभाव विद्यार्थियों के मनोविज्ञान पर पड़ता है। शिक्षा केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि शिक्षकों के आचरण से भी मिलती है। इसलिए शिक्षक का चरित्र ही उसकी सबसे बड़ी योग्यता माना जाता है।

    छत्तीसगढ़ में नए स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव के सामने शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता सुधारने के साथ-साथ अनुशासन और नैतिकता को मजबूत करने की भी बड़ी चुनौती है। प्रदेश की जनता उनसे यह अपेक्षा कर रही है कि ऐसे मामलों में त्वरित, निष्पक्ष और नियमसम्मत जांच सुनिश्चित हो तथा जहां आरोप सिद्ध हों, वहां ऐसा निर्णय लिया जाए जो भविष्य में किसी भी कर्मचारी के लिए स्पष्ट संदेश बने कि विद्यालय की गरिमा से खिलवाड़ किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

    यह किसी व्यक्ति या पूरे शिक्षक समुदाय पर प्रश्न उठाने का विषय नहीं है। प्रदेश के अधिकांश शिक्षक पूरी निष्ठा और समर्पण से अपने दायित्व निभा रहे हैं तथा समाज के लिए प्रेरणा हैं। किंतु कुछ मामलों में सामने आने वाला कथित अनैतिक आचरण पूरे शिक्षक समाज की प्रतिष्ठा को आहत करता है। इसलिए ईमानदार शिक्षकों के सम्मान और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध कानून और सेवा नियमों के अनुसार कठोर तथा पारदर्शी कार्रवाई हो।

    शिक्षा का मंदिर तभी पवित्र रह सकता है जब वहां ज्ञान के साथ-साथ अनुशासन, नैतिकता और जवाबदेही भी सर्वोच्च मूल्य बने रहें। समाज की नजर अब केवल कार्रवाई पर नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और प्रभावी परिणाम पर है।

    विशेष लेख
    नंदनवन जंगल सफारी नवाँ रायपुर में पर्यटकों के लिए कई प्रकार की रोमांचक सफारी राइड्स उपलब्ध हैं, जिनमें शाकाहारी सफारी, टाइगर सफारी, भालू सफारी और लायन सफारी प्रमुख हैं। इसके अलावा यहाँ एक छोटा चिड़ियाघर (नंदनवन जू) भी है।
    छत्तीसगढ़ की राजधानी नवा रायपुर (अटल नगर) के सेक्टर-39 में स्थित नंदनवन जंगल सफारी राज्य के प्रमुख पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण केंद्रों में शामिल है। 320.15 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह विशाल परिसर प्रकृति प्रेमियों, वन्यजीव प्रेमियों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। यहां वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ पर्यटकों को प्राकृतिक वातावरण में वन्यजीवों को देखने और उनके बारे में जानने का अवसर मिलता है।
    मिनी जू से जंगल सफारी तक का सफर
    नंदनवन की शुरुआत वर्ष 1979 में रायपुर में ‘नंदनवन मिनी जू’ के रूप में हुई थी। यह वन्यजीवों के रेस्क्यू और राहत केंद्र के रूप में विकसित किया गया था। वर्ष 2008 में केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सीजेडए) ने इसे आधिकारिक रूप से ‘मिनी जू’ की मान्यता दी।
    इसके बाद नवा रायपुर में आधुनिक और विशाल जंगल सफारी विकसित करने के लिए वर्ष 2012 से 2015 के बीच 320.15 हेक्टेयर भूमि आवंटित की गई। 1 नवंबर 2016 को छत्तीसगढ़ राज्य के 16वें स्थापना दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने नंदनवन जंगल सफारी का उद्घाटन किया।
    वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण शिक्षा पर विशेष जोर
    नंदनवन जंगल सफारी का मुख्य उद्देश्य वन्यजीवों का संरक्षण, दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण एवं प्रजनन और लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यहां वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप सुरक्षित और तनावमुक्त आवास उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है। विद्यार्थियों और पर्यटकों को वन्यजीवों तथा जैव विविधता के महत्व की जानकारी देने के लिए यहां विभिन्न पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।
    पांच प्रमुख सफारी जोन हैं आकर्षण का केंद्र
    नंदनवन जंगल सफारी को वन्यजीवों की सुरक्षा और पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग जोन में विकसित किया गया है।


    शाकाहारी सफारी
    30.89 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस जोन में चीतल, सांभर, नीलगाय और काला हिरण जैसे वन्यजीव प्राकृतिक वातावरण में विचरण करते हैं।
    भालू सफारी
    20.03 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित भालू सफारी पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। यहां भालुओं को प्राकृतिक वातावरण में देखने का अवसर मिलता है।
    बाघ सफारी
    20.04 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली बाघ सफारी में पर्यटक देश के राष्ट्रीय पशु बाघ को करीब से देखने का रोमांचक अनुभव प्राप्त करते हैं।
    सिंह सफारी
    20.01 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित सिंह सफारी में एशियाई शेरों का संरक्षण किया जा रहा है।

    जू जोन
    50 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले जू जोन में विभिन्न प्रजातियों के पक्षी, सरीसृप और अन्य वन्यजीव आकर्षण का केंद्र हैं।
    दुर्लभ और विशेष वन्यजीवों का भी संरक्षण
    नंदनवन जंगल सफारी में विभिन्न चिड़ियाघरों के साथ पशु विनिमय कार्यक्रम के माध्यम से कई दुर्लभ और विशेष वन्यजीवों को लाया गया है। यहां सफेद बाघ, दरियाई घोड़ा, घड़ियाल और क्लोन जंगली भैंसा ‘दीपाशा’ जैसे वन्यजीव पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण हैं।

    देश-विदेश से पहुंचते हैं पर्यटक
    वनमंडलाधिकारी थेजस शेखर ने बताया कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप की मंशानुरूप नंदनवन जंगल सफारी पर्यटकों के बीच लगातार लोकप्रिय हो रहा है। गौरतलब है कि वर्ष 2018-19 में ही देश-विदेश से 1 लाख 74 हजार 611, वर्ष 2019-20 में 1 लाख 60 हजार 767 ,वर्ष 2020-21 में 1 लाख 60 हजार 32, वर्ष 2021-22 में 1 लाख 73 हजार 72, वर्ष 2022-23 में 2 लाख 77 हजार 881, वर्ष 2023-24 में 2 लाख 62 हजार 486, वर्ष 2024-25 में 2 लाख 70 हजार 942, वर्ष 2025-26 में 3 लाख 24 हजार 785, से अधिक पर्यटकों ने जंगल सफारी का भ्रमण किया। यह आंकड़ा इसकी बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है।
    जैव विविधता संरक्षण के प्रति जागरूकता का केंद्र
    नंदनवन जंगल सफारी में अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस, विश्व बाघ दिवस और वन्यजीव सप्ताह जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों के माध्यम से लोगों, विद्यार्थियों और पर्यटकों को वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा के प्रति जागरूक किया जाता है।
    रायपुर से आसान पहुंच
    नंदनवन जंगल सफारी नवा रायपुर (अटल नगर) के सेक्टर-39 में स्थित है। यह स्वामी विवेकानंद अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे, रायपुर से लगभग 15 किलोमीटर और रायपुर रेलवे स्टेशन से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जंगल सफारी प्रत्येक सोमवार को बंद रहती है।
    वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण शिक्षा का ऐसा अनूठा केंद्र
    नंदनवन जंगल सफारी आज छत्तीसगढ़ में पर्यटन, वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण शिक्षा का ऐसा अनूठा केंद्र बन चुका है, जहां प्रकृति के करीब पहुंचकर वन्यजीवों को देखने के साथ-साथ उनके संरक्षण का संदेश भी मिलता है .
    साभार
    धनंजय राठौर (संयुक्त संचालक, जनसंपर्क )
    अशोक कुमार चंद्रवंशी (सहायक जनसंपर्क अधिकारी)

    राजनीति में कुछ लोग जनसेवा से पहचान बनाते हैं, कुछ संघर्ष से, और कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी पहचान कैमरे के एंगल, रीलों और पीआर मैनेजमेंट से बनती है। कहते हैं कि एक विधायक महोदय पर "महादेव" की ऐसी असीम कृपा हुई कि देखते ही देखते अपना भव्य मीडिया हाउस खड़ा हो गया। राजधानी की एक पॉश कॉलोनी में स्थित आलीशान कार्यालय देखकर सहज ही प्रश्न उठता है कि यह पत्रकारिता का केंद्र है या फिर ब्रांड मैनेजमेंट का कॉरपोरेट स्टूडियो?

    मिशन वाली पत्रकारिता कब लग्ज़री प्रोजेक्ट में बदल गई, इसका शायद सबसे जीवंत उदाहरण यही है। यहां खबरें कम और इमेज बिल्डिंग ज्यादा दिखाई देती है।

    विधायक महोदय की सबसे बड़ी ताकत बताई जाती है—पीआर और इवेंट मैनेजमेंट। कहते हैं कि उन्होंने निजी दुख को भी सार्वजनिक आयोजन में बदलने की कला विकसित कर ली है। परिवार में शोक का अवसर आया तो श्मशान घाट तक में वीआईपी व्यवस्थाओं की चर्चा रही। संवेदना प्रकट करने वालों के फोन भी मानो इतिहास का हिस्सा बन गए—रिकॉर्ड हुए, संपादित हुए और सोशल मीडिया पर प्रसारित भी हुए।

    ऐसा लगा कि संवेदना भी अब कंटेंट कैलेंडर का हिस्सा बन चुकी है। बस एक औपचारिकता बाकी रह गई थी—"इस शोक आयोजन को सफल बनाने के लिए आप सभी का हार्दिक धन्यवाद" वाला पोस्टर।

    रीलों की दुनिया में शायद यही नया राजनीतिक दर्शन है—जो कैमरे में कैद नहीं हुआ, वह हुआ ही नहीं।

    दिलचस्प बात यह भी है कि विधायक महोदय अक्सर अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और जनप्रतिनिधियों पर अपरोक्ष टिप्पणियां करने से नहीं चूकते। शायद उन्हें यह याद दिलाने की जरूरत है कि पिछले लगभग 25 वर्षों में प्रदेश में करीब 20 वर्ष उनकी ही सरकार रही है और  लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व भी लंबे समय से उनकी अपनी ही पार्टी के सांसद करते रहे हैं। ऐसे में अपनी ही राजनीतिक परंपरा, नेतृत्व और संगठन के योगदान को नज़रअंदाज़ कर तंज कसना राजनीतिक परिपक्वता कम और तात्कालिक लोकप्रियता की कोशिश अधिक प्रतीत होता है।

    जनता नेताओं से संवाद चाहती है, स्व-प्रचार नहीं; जवाबदेही चाहती है, पटकथा नहीं; और सेवा चाहती है, स्टूडियो नहीं।

    लोकतंत्र में कैमरे की चमक कुछ समय के लिए तालियां दिला सकती है, लेकिन इतिहास में जगह केवल वही बनाता है जो काम की रोशनी से पहचाना जाए। रीलें कुछ सेकंड चलती हैं, जबकि जनसेवा की असली पटकथा जनता वर्षों तक याद रखती है।

    आम जनता उठा रही दोहरे मानदंड का मुद्दा; स्थानीय सरकारी बंगलों के आवंटन और उपयोग पर नियम स्पष्ट करने की मांग

    शौर्यपथ लेख ।  नकटी गांव में विधायक निवास के लिए भूमि खाली कराए जाने को लेकर जारी विवाद के बीच अब एक नया सवाल राजनीतिक और जनचर्चा का विषय बन गया है। आम नागरिक यह जानना चाहते हैं कि यदि गांव की जमीन पर सरकारी आवास निर्माण के लिए कार्रवाई की जा रही है, तो ऐसे विधायक और मंत्री जो पहले से राजधानी रायपुर में शासन द्वारा आवंटित सरकारी बंगले में रह रहे हैं, वे अपने स्थानीय विधानसभा क्षेत्र में सरकारी आवास या बंगलों का उपयोग किस नियम के तहत कर रहे हैं।

    इस पूरे मामले में स्थानीय विधायक अनुज शर्मा का कहना है कि प्रभावित 75 परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास आवंटित कर दिए गए हैं और किसी के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा। हालांकि, इस बयान के बावजूद स्थानीय स्तर पर यह बहस तेज हो गई है कि जनप्रतिनिधियों के लिए सरकारी आवासों के आवंटन संबंधी नियमों का पालन समान रूप से हो रहा है या नहीं।

    चर्चा का केंद्र यह है कि यदि छत्तीसगढ़ शासन के नियमों के अनुसार विधायक एवं मंत्रियों को राजधानी में सरकारी आवास उपलब्ध कराया जाता है, तो क्या उन्हें अपने ही विधानसभा क्षेत्र में भी सरकारी बंगले के उपयोग की अनुमति है? यदि है, तो उसका कानूनी आधार क्या है, और यदि नहीं, तो ऐसे मामलों में अब तक क्या कार्रवाई की गई है?

    जनता का कहना है कि कानून और नियम सभी के लिए समान होने चाहिए। यदि आम नागरिकों के अतिक्रमण या शासकीय भूमि से जुड़े मामलों में बुलडोजर और सख्त कार्रवाई की जाती है, तो जनप्रतिनिधियों द्वारा स्थानीय स्तर पर सरकारी बंगलों के उपयोग की भी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस विषय पर सरकार को स्पष्ट स्थिति सामने रखनी चाहिए। यदि स्थानीय सरकारी आवासों का आवंटन किसी विशेष नियम, प्रशासनिक आदेश या सुरक्षा कारणों से किया गया है, तो उसकी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके।

    अब सबकी नजर राज्य सरकार पर है। देखना होगा कि सरकार स्थानीय विधानसभा क्षेत्रों में जनप्रतिनिधियों द्वारा उपयोग किए जा रहे सरकारी आवासों की स्थिति स्पष्ट करती है या नहीं। यदि किसी प्रकार का नियम उल्लंघन पाया जाता है, तो क्या समान मानदंड अपनाते हुए कार्रवाई होगी, या फिर यह विवाद केवल राजनीतिक बहस तक ही सीमित रह जाएगा।

    नोट: इस समाचार में व्यक्त प्रश्न और दावे सार्वजनिक चर्चा एवं जनभावनाओं पर आधारित हैं। यह आवश्यक है कि संबंधित नियमों, आवंटन आदेशों और शासन के आधिकारिक अभिलेखों की जांच के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाए।

    लेख : राजनीतिक विश्लेषण

    दुर्ग। दुर्ग नगर निगम की राजनीति इन दिनों विकास से अधिक गुटबाजी और शक्ति प्रदर्शन की चर्चाओं के केंद्र में दिखाई दे रही है। बरसात की शुरुआत के साथ जहां शहर के अनेक वार्ड जलभराव, सफाई व्यवस्था, गड्ढों, बदबू और मूलभूत समस्याओं से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर निगम के बड़ी संख्या में पार्षदों का केरल भ्रमण राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे रहा है।

    राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पहले कुछ पार्षदों के साथ पुरी यात्रा की तैयारी चल रही थी, लेकिन अचानक केरल यात्रा का कार्यक्रम सामने आया और अधिकांश पार्षद उसी ओर रवाना हो गए। इसे लेकर तरह-तरह की राजनीतिक व्याख्याएं की जा रही हैं। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि आखिर यह केवल पर्यटन है या इसके पीछे भविष्य की राजनीतिक रणनीति भी आकार ले रही है?

    यात्रा बनी शक्ति प्रदर्शन का माध्यम?

    इस यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें केवल एक दल के नहीं, बल्कि कांग्रेस, भाजपा और निर्दलीय पार्षद भी एक साथ दिखाई दिए। इससे यह संदेश गया कि स्थानीय राजनीति में वैचारिक सीमाओं से अधिक व्यक्तिगत समीकरण और गुटीय संतुलन प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी बड़े समूह का एक मंच पर आना भविष्य की राजनीतिक दिशा का संकेत माना जाता है। ऐसे में यह यात्रा केवल पर्यटन न होकर शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखी जा रही है।

    खर्च को लेकर भी उठ रहे सवाल

    यात्रा के खर्च को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं हैं। कुछ पार्षदों का दावा है कि प्रति व्यक्ति 10 से 15 हजार रुपये का योगदान लिया गया, जबकि सामान्य यात्रा व्यय का अनुमान इससे कहीं अधिक बताया जा रहा है। ऐसे में शहर में यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि वास्तविक खर्च अधिक है तो शेष राशि की व्यवस्था किसने की?

    हालांकि इन चर्चाओं की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर लगातार अटकलों का दौर जारी है।

    वार्डों की चिंता या राजनीतिक गणित?

    बरसात के मौसम में शहर के अनेक हिस्सों में जल निकासी, कचरा प्रबंधन और सड़क मरम्मत जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। ऐसे समय में बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों का एक साथ लंबी यात्रा पर जाना नागरिकों के बीच भी चर्चा का विषय बन गया है।

    आलोचकों का कहना है कि जनप्रतिनिधियों की पहली प्राथमिकता अपने वार्ड की समस्याओं का समाधान होना चाहिए, जबकि समर्थकों का तर्क है कि जनप्रतिनिधियों को भी समय-समय पर सामूहिक संवाद और विश्राम का अवसर मिलना चाहिए। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच जनता अपने सवालों के उत्तर तलाश रही है।

    गुटबाजी का नया अध्याय?

    दुर्ग निगम की राजनीति पिछले कुछ समय से लगातार गुटीय समीकरणों के कारण सुर्खियों में रही है। सामान्य सभा से लेकर विकास कार्यों तक कई बार मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं। अब केरल यात्रा ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में यदि निगम की राजनीति में कोई बड़ा घटनाक्रम होता है, तो इस यात्रा को उसके शुरुआती संकेतों में गिना जा सकता है। हालांकि यह केवल राजनीतिक विश्लेषण है और भविष्य की दिशा आने वाला समय ही तय करेगा।

    जनता पूछ रही है...

    जनता के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता शहर का विकास है या राजनीतिक गुटों का विस्तार? आखिर वार्डों की समस्याओं के बीच पर्यटन को प्राथमिकता क्यों मिली? और यदि यह केवल निजी यात्रा थी, तो इतनी बड़ी संख्या में पार्षदों का एक साथ जाना संयोग है या किसी बड़े राजनीतिक समीकरण का हिस्सा?

    अंतिम बात

    लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को यात्रा करने, संवाद करने और राजनीतिक रणनीति बनाने का पूरा अधिकार है। लेकिन उसी लोकतंत्र में जनता को यह अपेक्षा भी रहती है कि उसके प्रतिनिधि सबसे पहले उसके वार्ड, उसकी सड़क, उसकी नाली और उसकी मूलभूत समस्याओं को प्राथमिकता दें।

    केरल यात्रा समाप्त हो जाएगी, तस्वीरें भी सोशल मीडिया से धीरे-धीरे गायब हो जाएंगी, लेकिन शहर की टूटी सड़कें, जलभराव, कचरे के ढेर और जनता के सवाल वहीं रहेंगे। अब निगाहें इस बात पर हैं कि यात्रा से लौटने के बाद जनप्रतिनिधि विकास की नई पटकथा लिखेंगे या फिर दुर्ग की राजनीति में किसी नए "ऑपरेशन" की शुरुआत होगी।

    योग फॉर हेल्दी एजिंग: स्वस्थ और सक्रिय जीवन की दिशा में एक कदम

    साभार - • डॉ. दानेश्वरी सम्भाकर
    उप संचालक, जनसंपर्क

    रायपुर, / भारत में प्राचीन काल से ही योग हमारी जीवनशैली और संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। ऋषि-मुनियों, योगियों और संतों ने योग के माध्यम से स्वस्थ शरीर, शांत मन और आध्यात्मिक चेतना का मार्ग दिखाया। भारतीय ज्ञान परंपरा की यह अमूल्य धरोहर आज विश्वभर में स्वास्थ्य और कल्याण का पर्याय बन चुकी है। इसी विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की पहल पर वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्यता प्रदान की, जो आज विश्वव्यापी जनआंदोलन का स्वरूप ले चुका है।

    वर्ष 2026 के अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की थीम “योग फॉर हेल्दी एजिंग” (स्वस्थ एवं सक्रिय वृद्धावस्था के लिए योग) रखी गई है। यह थीम योग के माध्यम से जीवन के प्रत्येक चरण में शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का संदेश देती है। योग न केवल रोगों से बचाव का प्रभावी माध्यम है, बल्कि स्वस्थ और सक्रिय जीवनशैली की आधारशिला भी है।

    प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने योग को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके नेतृत्व में योग आज विश्व के करोड़ों लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुका है। प्रधानमंत्री का मानना है कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाली जीवन पद्धति है। योग व्यक्ति को स्वस्थ बनाकर परिवार समाज और राष्ट्र को सशक्त बनाने का माध्यम बनता है इस वर्ष राष्ट्रीय स्तर का मुख्य आयोजन कोलकाता में आयोजित किया जा रहा है जहां प्रधानमंत्री स्वयं योगाभ्यास का नेतृत्व करेंगे।

    छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का राज्य स्तरीय मुख्य समारोह अंबिकापुर में आयोजित किया जा रहा है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय स्वयं योगाभ्यास में सहभागिता करेंगे और प्रदेशवासियों को नियमित योग अपनाकर स्वस्थ जीवनशैली अपनाने का संदेश देंगे। राज्य सरकार द्वारा योग को जन-जन तक पहुंचाने के लिए विभिन्न विभागों, शैक्षणिक संस्थानों, पंचायतों और सामाजिक संगठनों के सहयोग से व्यापक स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

    मुख्यमंत्री श्री साय का मानना है कि स्वस्थ नागरिक ही विकसित छत्तीसगढ़ और विकसित भारत के निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति हैं। योग शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक संतुलन, सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास को भी बढ़ाता है। यही कारण है कि राज्य सरकार स्वास्थ्य संवर्धन और जनजागरूकता अभियानों में योग को विशेष महत्व दे रही है।

    प्राकृतिक संसाधनों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ में योग का संदेश लोगों के जीवन से सहज रूप से जुड़ता है। प्रदेश के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवनशैली योग के मूल सिद्धांतों को प्रतिबिंबित करती है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, आंगनबाड़ी केंद्रों और शासकीय संस्थानों में नियमित योग गतिविधियों के माध्यम से स्वस्थ समाज निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं।

    वर्तमान समय में बढ़ते तनाव, अनियमित जीवनशैली और विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं के बीच योग एक सरल, सुलभ और प्रभावी समाधान के रूप में उभरा है। नियमित योगाभ्यास शरीर को निरोग, मन को शांत और जीवन को संतुलित बनाता है। यह व्यक्ति को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान कर जीवन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता विकसित करता है।

    अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि योग को केवल एक दिवस का आयोजन न मानकर दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं। स्वस्थ शरीर, स्वस्थ मन और स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए योग को अपनाना समय की आवश्यकता है। आइए, योग के माध्यम से स्वस्थ छत्तीसगढ़, विकसित भारत और समृद्ध विश्व के निर्माण में अपना योगदान दें।

    दुर्ग। राजनीति में भीड़ केवल संख्या नहीं होती, बल्कि वह जनस्वीकृति, संगठनात्मक शक्ति और भविष्य की संभावनाओं का संकेत भी मानी जाती है। प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव के 49वें जन्मदिवस पर दुर्ग के सेवा सदन में उमड़ा जनसैलाब अब केवल जन्मदिन समारोह तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने शहर की राजनीति में कई नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

    15 जून को आयोजित जन्मदिन समारोह में हजारों लोगों की उपस्थिति, घंटों तक बधाई देने के लिए लगी कतारें और पूरे शहर में दिखाई दिए बैनर-पोस्टर अब राजनीतिक विश्लेषण का विषय बन चुके हैं। स्वयं मंत्री गजेंद्र यादव ने भी सार्वजनिक रूप से कहा कि शायद ही किसी नेता के जन्मदिन पर इतनी बड़ी संख्या में लोग एकत्रित हुए होंगे। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस आयोजन की चर्चा लगातार जारी है।

    भाजपा में वर्चस्व की नई तस्वीर?

    दुर्ग भाजपा की राजनीति में लंबे समय तक डॉ. सरोज पांडे को सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय नेताओं में गिना जाता रहा है। उनके समर्थकों की मजबूत टीम और संगठन पर पकड़ हमेशा चर्चा का विषय रही है। लेकिन इस बार मंत्री गजेंद्र यादव के जन्मदिन पर जो दृश्य देखने को मिला, उसने भाजपा के भीतर शक्ति संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

    विशेष रूप से यह चर्चा इसलिए भी तेज है क्योंकि डॉ. सरोज पांडे के परंपरागत समर्थक माने जाने वाले कई कार्यकर्ताओं और नेताओं ने भी मंत्री गजेंद्र यादव के जन्मदिन पर बड़े पैमाने पर बधाई संदेश, पोस्टर और बैनर लगाए। पूरा शहर मानो गजेंद्र यादव के जन्मोत्सव के रंग में रंगा दिखाई दिया।

    अब राजनीतिक पर्यवेक्षकों की निगाहें 22 जून पर टिक गई हैं, जब डॉ. सरोज पांडे का जन्मदिवस मनाया जाएगा। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि दोनों आयोजनों की तुलना स्वाभाविक रूप से होगी और इससे भाजपा के भीतर लोकप्रियता तथा जनाधार को लेकर नए निष्कर्ष निकाले जाएंगे।

    कांग्रेस में भी बढ़ी बेचैनी

    मंत्री गजेंद्र यादव की बढ़ती लोकप्रियता का असर केवल भाजपा तक सीमित नहीं है। कांग्रेस के भीतर भी इसे गंभीरता से देखा जा रहा है। दुर्ग की राजनीति में चार दशकों तक प्रभावशाली रहे वोरा परिवार के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    पूर्व विधायक अरुण वोरा लंबे समय तक कांग्रेस का प्रमुख चेहरा रहे हैं। हालांकि वर्तमान राजनीतिक माहौल में उनकी स्वीकार्यता और प्रभाव को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। भाजपा समर्थकों का दावा है कि प्रदेश और केंद्र में कांग्रेस की सरकारें रहने के बावजूद दुर्ग शहर को वह विकास नहीं मिला, जिसकी जनता अपेक्षा करती थी। दूसरी ओर वर्तमान सरकार के कार्यकाल में हुए विकास कार्यों को भाजपा अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है।

    इसी बीच कांग्रेस के युवा और सक्रिय चेहरों में धीरज बाकलीवाल का नाम तेजी से उभर रहा है। लगातार जनसंपर्क, सामाजिक गतिविधियों और आम जनता के बीच सक्रिय उपस्थिति के कारण उन्हें कांग्रेस का संभावित मजबूत चेहरा माना जा रहा है। राजनीतिक चर्चाओं में यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि भविष्य में भाजपा पुनः गजेंद्र यादव को उम्मीदवार बनाती है, तो कांग्रेस की ओर से मुकाबले के लिए कौन सबसे सक्षम प्रत्याशी होगा।

    क्या भीड़ भविष्य की राजनीति तय करती है?

    राजनीतिक इतिहास बताता है कि किसी आयोजन में उमड़ी भीड़ हमेशा चुनावी जीत की गारंटी नहीं होती, लेकिन यह जनभावना और संगठनात्मक क्षमता का महत्वपूर्ण संकेत अवश्य देती है। गजेंद्र यादव के जन्मोत्सव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वर्तमान समय में उनका जनसंपर्क और राजनीतिक प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है।

    साथ ही यह भी सत्य है कि विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं और राजनीति में परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं। आने वाले समय में भाजपा और कांग्रेस दोनों की रणनीतियां, उम्मीदवार चयन और जनसंपर्क अभियान राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करेंगे।

    निष्कर्ष

    फिलहाल इतना स्पष्ट है कि मंत्री गजेंद्र यादव का जन्मदिन समारोह केवल एक सामाजिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि उसने दुर्ग की राजनीति में वर्चस्व, लोकप्रियता और भविष्य के नेतृत्व को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है। भाजपा में कौन सबसे बड़ा जननेता है और कांग्रेस का अगला मजबूत चेहरा कौन होगा—इन दोनों सवालों के उत्तर भविष्य देगा।

    लेकिन वर्तमान परिदृश्य में यदि कोई नेता सबसे अधिक चर्चा के केंद्र में है, तो वह निस्संदेह प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव हैं, जिनके जन्मोत्सव ने दुर्ग की राजनीति का तापमान बढ़ा दिया है।

    प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं एवं उनके उज्ज्वल राजनीतिक भविष्य की मंगलकामनाएं।

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