August 13, 2026
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    शिक्षकों को आवारा कुत्तों की निगरानी का जिम्मा, बघेल ने बताया अपमान – मंत्री बोले, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कार्रवाई Featured

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       रायपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ में शिक्षकों को स्कूलों के आसपास आवारा कुत्तों और मवेशियों की निगरानी का जिम्मा सौंपे जाने को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। एक ओर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसे शिक्षकों का अपमान बताते हुए सरकार पर तीखा हमला बोला है, वहीं स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने कहा है कि यह कदम सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत बच्चों की सुरक्षा और मध्यान भोजन की स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।
    दरअसल, छत्तीसगढ़ लोक शिक्षण संचालनालय ने हाल ही में एक आदेश जारी किया है, जिसके तहत स्कूलों के प्राचार्य अथवा संस्था प्रमुख को “नोडल अधिकारी” नियुक्त किया गया है। इन नोडल अधिकारियों को स्कूल परिसर या आसपास घूमने वाले आवारा कुत्तों और मवेशियों की जानकारी स्थानीय निकायों — ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत या नगर निगम — को देने की जिम्मेदारी दी गई है।
    यह आदेश बलौदा बाजार के एक स्कूल में हुई घटना के बाद जारी हुआ, जहां एक कुत्ते ने मध्यान भोजन को जूठा कर दिया था। इस मामले में उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार पर जुर्माना लगाया था और प्रत्येक छात्र को क्षतिपूर्ति राशि देने का निर्देश दिया था। शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने बताया कि “सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद ही यह कदम उठाया गया है ताकि भविष्य में बच्चों के भोजन की स्वच्छता और सुरक्षा को लेकर किसी प्रकार की गड़बड़ी न हो।”
    वहीं इस आदेश को लेकर शिक्षकों में नाराजगी है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि उन्हें पहले ही कई गैर-शैक्षणिक गतिविधियों में शामिल किया जाता है, ऐसे में इस नए कार्य से पढ़ाई पर ध्यान देना और कठिन हो जाएगा। कुछ शिक्षकों ने व्यंग्य करते हुए कहा, “अब हम पढ़ाएं या कुत्ते गिनें?”
    राजनीतिक स्तर पर भी यह मुद्दा गरमा गया है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा, “गुरुजी बच्चों को पढ़ाएं या कुत्तों को भगाएं? यह आदेश शिक्षकों का सार्वजनिक अपमान है और इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए।” उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पर अफसरशाही हावी है और शिक्षा व्यवस्था को कमजोर किया जा रहा है।
    वहीं, इस मुद्दे पर नेता प्रतिपक्ष डॉक्टर चरण दास महंत ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि, “अगर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है तो उस पर टिप्पणी नहीं की जा सकती, लेकिन शिक्षकों पर लगातार गैर-शैक्षणिक कार्यों का दबाव बढ़ने से शिक्षा की गुणवत्ता गिर रही है।”
    फिलहाल, यह मामला प्रशासनिक निर्देश से शुरू होकर अब राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बन गया है। शिक्षक संगठनों ने आदेश रद्द करने की मांग की है, वहीं सरकार बच्चों की सुरक्षा को लेकर अपने रुख पर कायम है।

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