August 12, 2026
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    छग माध्यमिक शिक्षा मंडल के उत्तर पुस्तिकाओं की जांच में बरती गई कोताही की हो उच्च स्तरीय जांच

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    दुर्ग / शौर्यपथ / संयुक्त किसान मोर्चा के उपाध्यक्ष दीनदयाल साहू ने दसवी एव बारहवीं कक्षा के परीक्षा परिणाम के संबंध में एक विज्ञप्ति के माध्यम से कहा है कि दसवीं एवं बारहवी की उत्तर पुस्तिका में रोल नंबर लिखने के साथ ही पहली बार परीक्षाथियेां के नाम लिखना व उनका फेल होना या पूरक आना अनेकों संदेह को जन्म देता है क्येांकि उक्त छात्र-छात्राओं के पुर्नमूल्यांकन के समय उनका नंबर का बढना या पास होना यह साधारण घटना नही है। यह ऐसा प्रतीत होता है कि माध्यमिक शिक्षा मंडल के जांच में लगे शिक्षक क्षेत्रवाद, जातिवाद से ग्रसित होकर उत्तर पुस्तिका के नामों और सर्नेम को देखकर नंबर दिया जाता है या छात्रों को फेल-पास किया जाता है। जिससे माध्यमिक शिक्षा मंडल की विश्सनीयता पर सवालिया निशान लग रहा है।
    ज्ञात हो कि पुर्नमूल्यांकन में नंबर बढाकर माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा उत्तर पुस्तिका में रोल नंबर के साथ नाम और सर्नेम अतिरिक्त पहचान का उल्लेख क्यों करवाया गया है? उसका जवाब देना चाहिए। क्योंकि आज तक ऐसा नही हुआ है, और छात्र-छात्राओं के द्वारा मांग किये जाने पर उत्तर पुस्तिका का फोटो कापी भी अभी तक नही दिया गया है।
    ज्ञातव्य हो कि 64 हजार छात्र-छात्राओं का सप्लीमेंटरी आना छग सरकार के शिक्षा नीति और पढाई के स्तर के लिए सोचनीय विषय है। श्री साहू ने आगे बताया कि लगभग 24 हजार छात्र-छात्राओं द्वारा अपने रिजल्ट से संतुष्ट नही होना और पुर्नगणना, पुर्नमूल्यांकन, एवं उत्तर पुस्तिका को देखने की मांग किया जाना रूटिन वर्क कहना बेईमानी होगा। श्री साहू ने आगे कहा कि परीक्षा के दौरान उत्तर पुस्तिका में छात्र-छात्राओं के रेाल नंबर के साथ उसके नाम का उल्लेख करवाया जाना और उसके सर्नेम को लिखवाया जाना किसी षडयंत्र के तहत अनुतीर्ण करने एवं प्रतिभावान छात्रों को निराश किये जाने का कही घृषित सरकारी चाल तो नही है, क्योंकि छात्र-छात्राओं के पुर्नमुल्यांकन में 20 नंबर से 50 नंबर तक बढे हैं, और इस संबंध में कुछ कॉपी जांचने वाले शिक्षकों पर छोटी-मोटी कार्यवाही करने का संकेत मिला है, छग माध्यमिक शिक्षा मंडल के के तहत आने वाले स्कूलों में गरीब और साधारण तबके के लोगों के बच्चे पढते हैं और पैसे वालों के बच्चे सीबीएसई और केन्द्रीय विद्यालयों के अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढते हैं। इस बात को मद्दे नजर रखते हुए गरीब बच्चों के मां बाप बहुत मुश्किल से पेट काटकर अपने बच्चे एवं उनके भविष्य को संवारने सरकारी स्कूल में पढाते हैं, प्रतिभावान छात्रों को हतोत्साहित करना यह समझ से परे हैं और इनके परीक्षा परिणाम के कारण कई छात्र-छात्राएं आत्महत्या तक कर लेते हैं या मनोरोग के शिकार हो जाते हैं। उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। यह भी माध्यमिक शिक्षा मंडल को तय करना चाहिए।
    साहू ने आगे कहा कि प्रभावित छात्रों के परिणाम में यह देखना चाहिए कि कहीं ये सरस्वती शिशु मंदिर के या आर्य समाज के स्कूल के अथवा वर्ग विशेष या गैर छत्तीसगढिय़ा छात्र-छात्राएं तो नही है? इन बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों पर हमारी मांग है कि तत्काल कार्यवाही की जाये और इसकी उच्च स्तरीय जांच की जाए।

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