August 14, 2026
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    अगर ज़िंदगी में फोकस चाहते हैं तो भोजन के सही नियमों को अपनाइए -

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    इंस्पायरिंग /शौर्यपथ /

    आज के दौर में सबसे मुश्किल काम है प्रासंगिक बने रहना। आप कितनी भी ऊंचाई पर क्यों ना हो, अप्रासंगिक होने के डर में आप दौड़ते चले जाते हैं। समाज में, परिवार में, जॉब में अप्रासंगिक होने का डर आपको खाता है। हमारी लड़ाई इन दिनों रिलेवेंट बने रहने की है। जब मैं सफल हुआ तो अपने कुछ बुजुर्गों को देखकर सोचता था कि ये कैसे इतने शांत, खुश हैं।

    इसे डीएनए थ्योरी से समझने में मदद मिली। ये क्यों होता है कि एक घटना पर हर इंसान अलग प्रतिक्रियाएं देता है? किसी ने आपकी बेटी को छेड़ दिया तो हो सकता है आप उसकी शिकायत पुलिस में करें, यह भी हो सकता है कि आप उसका कत्ल कर दें... तो ऐसा कैसे! दरअसल ये सब डीएनए से होता है कि किस वक्त पर कौन-सा डीएनए एक्टिव है।

    मैं प्रैक्टिकल इंसान हूं इसलिए सही वक्त पर सही डीएनए एक्टिवेट करने का सिद्धांत समझने ऑस्ट्रिया गया। इस कोर्स के लिए तगड़ी रकम खर्च की। ये एक वेलनेस इंस्टिट्यूट था, जहां मेरा स्वागत इस बात से हुआ कि - आप इतने पैसे खर्च करके भारत से आए हैं, वो बातें सीखने के लिए जो हमने खुद भारत से ही सीखी हैं।

    अगले दिन सुबह डॉक्टर से मिला। मैं भूखा था, मैंने उनसे पूछा कि मुझे क्या खाना चाहिए। उन्होंने मुझे ब्रेड के चार पीस दिए, जो थोड़े सख्त थे। साथ में सूप जैसा कुछ था। वो बोले यही अगले तीन दिन तक आपका नाश्ता, लंच और डिनर है। मैं हैरान हुआ तो उन्होंने मुझे शांत किया और कहा आपको मनपसंद नाश्ता, खाना सब मिलेगा, लेकिन पहले आपको ये खाना होगा, वो भी हमारे दिए निर्देशों के अनुसार। मैंने मंजूर किया। उन्होंने मुझे बताया कि हम यहां एक रूल फॉलो करते हैं, 'ड्रिंक योर फूड, च्यू योर वॉटर'(अपने खाने को पीजिए और पानी को चबाइए)।

    मैंने उनसे इसका मतलब पूछा तो वो बोले - ब्रेड को 40 बार चबाइए, ऐसा करेंगे तो यह लिक्विड हो जाएगी, तभी उसे निगलिए। ये आसान नहीं होगा, आपका दिमाग आपको ऐसा करने से रोकेगा, लेकिन आपको फोकस बनाना है। जब सूप लेना चाहें, उसे सीधे मत निगलिए। मुंह में रखकर उसे महसूस कीजिए और फिर निगलिए।

    मैंने बिल्कुल ऐसा ही किया और यकीन मानिए मैं 14 मिनट में ब्रेड खत्म नहीं कर पाया, सूप तो भूल जाइए। मेरा पेट भर चुका था। आगे कुछ खाने लायक नहीं था। उन्होंने इसका राज मुझे बताया - मि.माधवन, आपका दिमाग जानता है कि आपको क्या चाहिए। 14 या 15 मिनट चबाने के बाद दिमाग कहता है बस बहुत हुआ! और आप तृप्त महसूस करने लगते हैं।

    मैंने इस बारे में और जानना चाहा तो उन्होंने बताया - आप अपने दिमाग और शरीर को बेहद कम आंकते हैं। जंगल में बैल से ज्यादा मसल किसी जानवर के नहीं होते...और बैल का दिमाग जानता है कि घास से उसे कैसे प्रोटीन हासिल करना है। तो आप क्यों प्रोटीन शेक पीकर, एक्सरसाइज करके मसल बनाने में लगे रहते हैं।

    दुनिया में जो भी सफल और महान हुए हैं एलेक्जेंडर से लेकर महात्माओं तक, सभी ने खाने को लेकर अनुशासन का पालन किया है। उन्होंने समझाया कि हम गलत वक्त पर खाना खाते हैं तो दिमाग को जब कई दूसरे कामों में लगना चाहिए, वो बेचारा केवल खाने को जहर बनने से रोकने में लगा होता है। इस तरह आप स्वस्थ नहीं रह सकते हैं। अगर आप स्वस्थ नहीं हैं तो दिमाग का सही चलना असंभव है। कोई भी समाज तब तक विकसित नहीं हो सकता जब तक वो स्वस्थ नहीं है, इस तरह हमारी दिमागी स्वास्थ्य भी पेट से जुड़ा है।

    प्रासंगिकता पर लौटते हैं, 50 साल का हीरो आखिर 17 साल की हीरोइन से कैसे तालमेल बैठाएगा। यह वाकई मुश्किल है लेकिन अगर आपकी जेब में किस्से हैं, आप अपनी उम्र से छोटे नजर आते हैं, ज्यादा यंग दिखते हैं, एनर्जी से भरपूर हैं तो आप वाकई वो हीरो हैं जिसकी प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं होगी। ये सब सही वक्त पर सही खाने से संभव है। आप भी कोशिश कीजिएगा।

    (2016 में आरडब्लूसी के मंच पर एक्टर आर.माधवन)

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