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June 17, 2026
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शौर्यपथ

शौर्यपथ


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मनोरंजन/ शौर्यपथ /‘भाबीजी घर पर हैं’ फेम शुभांगी अत्रे उर्फ ‘अंगूरी भाभी’ ने हाल ही में अपना टिकटॉक अकाउंट डिलीट कर दिया। दरअसल, उन्होंने ऐसा ‘लोकल कैंपेन’ को सपोर्ट करते हुए किया है। ऐप डिलीट करते हुए शुभांगी अत्रे ने कहा कि मैंने टिकटॉक इसलिए छोड़ा क्योंकि मैं लोकल बिजनेस को सपोर्ट करना चाहती हूं। मैं नहीं चाहती कि बाहर के ऐप्स हमारे देश की अर्थ व्यवस्था पर बुरा प्रभाव डालें।

शुभांगी आगे कहती हैं कि यह सच है कि यह एक पॉप्युलर मीडियम है और इसका इस्तेमाल आगे भविष्य में प्रमोशनल एक्टिविटी के लिए किया जा सकता है। लेकिन मैं अपने निर्णय पर अटल रहूंगी और इस ऐप का इस्तेमाल नहीं करूंगी। और भी कई मीडियम हैं जो लोकल हैं, मैं अब उन्हें इस्तेमाल करूंगी। उम्मीद करती हूं कि बाकी लोग भी इसे डिलीट कर लोकल प्लैटफॉर्म्स का ज्यादा इस्तेमाल करेंगे।

टिकटॉक पर न दिखने के कारण फैन्स उन्हें काफी मिस कर रहे हैं। इस बारे में बात करते हुए शुभांगी कहती हैं कि हां, मेरे बहुत सारे टिकटॉक फैन्स थे। अब मैं इतने सारे लोगों को एक साथ इस प्लैटफॉर्म को छोड़ने के लिए तो नहीं कह सकती। यह मेरा तरीका है देश के बाहर के प्रोडक्ट को न कहने का। खासकर उस दौर में जब उन्होंने हमारे देश, उसकी सेना और जवानों को इतनी मुश्किलें दीं।

शुभांगी अत्रे ‘वोकल फॉर लोकल’ कैंपेन को सपोर्ट करते हुए कहती हैं कि मुझे हमेशा से ही इस कैंपेन में भरोसा था। मैं हैंडलूम खरीदना बहुत पसंद करती हूं। घर पर भी जूट के कारपेट, डेकोरेशन का सामान, कई चीजें मैंने लोकल आर्टिस्ट से खरीदी हुई हैं। मोदी जी ने हमें इसे सपोर्ट करने के लिए कहा है तो अब तो मैं और इन चीजों को खरीदने का प्रयास करूंगी। हालांकि, फॉरेन प्रोडक्ट्स ने हमारे जीवन को आसान बनाया है लेकिन हमें भारतीय उत्पादों पर ध्यान देने की जरूरत है। मैं घर पर देख रही थी कि मेरे पास कितने फॉरेन उत्पाद हैं। हम सभी को आगे आकर इस कैंपेन को सपोर्ट करना चाहिए और देश के हित के बारे में सोचना चाहिए।

 

नजरिया / शौर्यपथ / दिल्ली में आप (आम आदमी पार्टी) सरकार की ताजा रायशुमारी सवालों के घेरे में है। उसने लोगों से यह पूछा है कि क्या कोरोना-काल में दिल्ली के अस्पतालों के बेड सिर्फ दिल्लीवालों के लिए आरक्षित होने चाहिए? इसके साथ ही, उसने पड़ोसी राज्यों से जुड़ी दिल्ली की सीमा भी फिलहाल बंद कर दी है। सवाल यह है कि जब नोएडा, गुरुग्राम जैसे इलाके राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, यानी एनसीआर का हिस्सा हैं, तो दिल्ली सरकार का यह कदम क्या सही है? सवाल यह भी कि जिस मकसद से एनसीआर की संकल्पना की गई थी, क्या वह आज पूरा हो रहा है? एनसीआर की सोच दशकों पुरानी है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आबादी के बोझ को थामने और यहां की औद्योगिक गतिविधियों को सीमित करने के लिए इसे मूर्त रूप दिया गया था। इसीलिए 1985 में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र योजना बोर्ड का गठन भी किया गया। आलम यह था कि शुरुआती वर्षों में किसी भी नई औद्योगिक इकाई को दिल्ली में स्थापित होने की इजाजत नहीं दी गई। नतीजतन, उत्तर प्रदेश के नोएडा और हरियाणा के गुरुग्राम जैसे इलाके ‘औद्योगिक हब’ बनकर उभरे। मगर लोगों में दिल्ली का आकर्षण कम नहीं हुआ। यही कारण है कि राजधानी क्षेत्र के आसपास के इलाकों में कंक्रीट की बहुमंजिली इमारतें खड़ी हुईं और नए-नए टाउनशिप बसाए गए। यहां रहने वाले लोग आज भी खुद को दिल्लीवासी ही समझते हैं।

अगर योजना मुताबिक काम हुआ होता, तो निश्चय ही एनसीआर आज ‘ग्रेटर दिल्ली’ माना जाता। मगर इससे जुड़े सभी राज्यों की अपनी-अपनी सियासत ने स्थिति यह बना दी है कि आज इसके अस्तित्व पर ही सवाल उठने लगे हैं। राज्य सरकारों में आपसी तालमेल बनाने की जरूरत थी, दीर्घकालिक नीति बननी चाहिए थी और संजीदगी से उन पर काम होना चाहिए था, पर ऐसा नहीं हो सका। इसलिए एनसीआर की विफलता इससे संबंधित सभी सरकारों की विफलता है। हालांकि, आज भी यदि कुछ प्रयास किए जाएं, तो बात बन सकती है। सबसे पहले तो स्वास्थ्य-सेवा के क्षेत्र में केंद्र और सभी राज्य सरकारों को मिलकर काम करना होगा।

अरविंद केजरीवाल जिस मसले को आज उठा रहे हैं, उनसे मेरा वास्ता 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में ही पड़ा था, जब मैं स्वास्थ्य सचिव थी। उस वक्त भी एम्स जैसे केंद्रीय अस्पतालों का कहना था कि अंतर-राज्यीय प्रवासियों की भारी संख्या उनके बुनियादी ढांचे को बिगाड़ रही है। ‘बाहरी’ लोगों के कारण सुपर स्पेशिएलिटी सेवा पर बुरा असर पड़ रहा है, जबकि यह सुविधा उन्हीं को मिलनी चाहिए, जिन्हें राज्य सरकार के अस्पताल रेफर करते हैं। इसी तरह, सफदरगंज जैसे अस्पताल मानते थे कि एम्स चुनिंदा मामलों को अपने यहां रखकर शेष उन्हें स्थानांतरित कर देता है, जिससे वे खुद को भेदभाव का शिकार मानते हैं। इन्हीं समस्याओं का हल निकालते हुए सभी मरीजों को अपॉइंटमेंट देने की व्यवस्था बनाई गई, जिसका दुष्प्रभाव यह पड़ा कि अस्पताल हद से अधिक बोझ से हांफने लगे। होना यह चाहिए था कि केंद्र या दिल्ली राज्य सरकार के अधीन अस्पतालों में भी, बाहरी लोगों को सिर्फ विशेषज्ञ सुविधा मिले। पर लोक-लुभावन राजनीति के कारण ऐसा नहीं हो सका, और हमारे बेहतरीन अस्पताल खुद बीमार रहने लगे। जाहिर है, यह सियासत नहीं, अस्पताल-प्रबंधन का मसला है। हमें इसी नजरिए से इसे देखना चाहिए।

दूसरा मुद्दा पुलिसिंग का है। दिल्ली-एनसीआर में पुलिस-सेवा से जुड़ी ऐसी कोई संयुक्त कमेटी बननी चाहिए थी, जो सूचनाएं आदि साझा करती। इससे कई मुश्किलों का हल निकल सकता था। जैसे, अभी कोई अपराधी एक राज्य में अपराध कर आसानी से एनसीआर के दूसरे राज्य में चला जाता है। तीसरा मसला यातायात-व्यवस्था का है। दिल्ली की सीमा से गुजरने वाली सड़कों पर जाम की स्थिति छिपी नहीं है। ऐसे में, संबंधित राज्यों के साथ तालमेल बनाते हुए यदि ऐसी किसी एजेंसी का गठन किया जाता, जो सीमा पर गाड़ियों की आवाजाही नियंत्रित करती, तो वह दिल्ली ही नहीं, एनसीआर के भी हित में होता। इससे बढ़ते प्रदूषण को भी कुछ हद तक थामा जा सकता था। कुल मिलाकर, एनसीआर की संकल्पना आज विफल लग रही है। इसे राजनीति और प्रशासनिक तौर पर महत्व ही नहीं दिया गया।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)शैलजा चंद्रा, पूर्व मुख्य सचिव, दिल्ली सरकार

 

सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / अमेरिका में श्वेत-अश्वेत के बीच तनाव की वापसी दुखद और चिंताजनक है। अमेरिका अपनी रंगभेदी नीतियों को करीब आधी सदी पीछे छोड़ आया था, मगर वास्तव में बदलाव एक हद तक कागजी ही बना हुआ है। रंगभेद की जमीनी हकीकत न केवल निराश करती है, बल्कि अमेरिका के लोकतांत्रिक समाज पर सवालिया निशान भी लगाती है। अमेरिका में अश्वेतों की आबादी 13 प्रतिशत ही है, लेकिन पुलिस के हाथों मारे जाने वालों में उनकी संख्या श्वेतों के मुकाबले ढाई गुना ज्यादा है। अमेरिका की इस स्याह हकीकत की चर्चा लगातार होती रही है, लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है कि तमाम अमेरिकी राज्यों में जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। और एक सुखद पक्ष यह कि इन प्रदर्शनों में श्वेत भी समान रूप से शामिल हैं।

जॉर्ज का दोष ऐसा नहीं था कि पुलिस के हाथों उसकी मौत होती। वह गिरफ्तारी का विरोध कर रहा था, लेकिन तीन पुलिस वाले उसे जमीन पर गिराकर उस पर सवार हो गए। एक पुलिस अफसर ने तो इतनी निर्ममता दिखाई कि लगभग नौ मिनट तक वह जॉर्ज की गरदन पर अपने घुटने के बल सवार रहा। जॉर्ज गुहार लगाता रहा कि उसे सांस लेने में तकलीफ हो रही है, लेकिन उसकी गुहार बेकार गई। इस मौत के वीडियो को लोगों ने वायरल कर दिया और अब अमेरिकी पुलिस बल अपने लोगों के रोष के निशाने पर है। अमेरिका के 70 से ज्यादा शहरों में प्रदर्शन या कहीं-कहीं उपद्रव भी हुुए हैं। वैसे लोगों का यह रोष नया नहीं है। अमेरिका में अनेक लोगों के मन में श्वेत वर्चस्व या रंग को लेकर श्रेष्ठता भाव बना हुआ है। घृणा का यह भाव न केवल अतार्किक, बल्कि अमानवीय भी है। इससे अमेरिकी समाज की बदनामी होती है। अमेरिकी समाज में रंगभेद दूर करने की तमाम जमीनी और किताबी कोशिशों के बावजूद वहां जो स्थिति है, उसकी प्रशंसा नहीं हो सकती। जब भी अश्वेतों के प्रति घृणा की बात उठती है, तो अमेरिका की चर्चा जरूर होती है। इस प्रदर्शन व उपद्रव के प्रति अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बहुत चिंतित हैं और उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि निर्दोष लोगों के जीवन और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, तो सरकार सेना भी तैनात कर सकती है। अमेरिका के लिए यह दोहरी मुसीबत का समय है। एक तरफ वह कोरोना जैसी महामारी से बड़े पैमाने पर जूझ रहा है, वहीं रंगभेद विवाद अमेरिकी प्रशासन के गले की नई हड्डी बन गया है।

अब पूरी दुनिया की नजर अमेरिका पर है। अमेरिका को महामारी और मानवीयता, दोनों ही मोर्चों पर परीक्षा से गुजरना होगा। जब महामारी ने मौत का जाल फैला रखा हो, तब तो लोगों के प्रति उदारता और मानवीयता का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। इस बीच अमेरिकी प्रशासन के लिए यह जरूरी है कि वह रंगभेद समर्थकों के साथ पूरी कड़ाई से पेश आए। रंगभेद को रोकने के लिए अमेरिकी सरकार को पहले से कहीं ज्यादा चौकस होना चाहिए। वहां पुलिस बल को भी शिक्षित-प्रशिक्षित करने की जरूरत है। पुलिस पर भी यह जिम्मेदारी है कि वह लोगों को आश्वस्त करे। अमेरिका में शांति और एकजुटता की जल्द से जल्द वापसी होनी चाहिए। सबके प्रति उदारता से ही अमेरिकी समाज में सभ्यता और अनुशासन की रौनक लौटेगी और दुनिया के दूसरे देश उससे अच्छे सबक लेंगे।

 

यह किसकी जिम्मेदारी
मेलबॉक्स /शौर्यपथ /जिस देश में अनाज का भंडारण खपत से तीन गुना ज्यादा हो, वहां कोई मां भूख से क्यों मर रही है? यह सवाल इसलिए, क्योंकि देश में अन्न का बफर स्टॉक रहने के बाद भी मजदूरों की मौत हुई है। ऐसा ही एक दर्दनाक वीडियो बिहार से आया, जहां एक महिला के शव पर पड़ी चादर से उसका अबोध बच्चा खेल रहा था। कहा गया है कि श्रमिक स्पेशल टे्रन में भूख-प्यास से इस महिला ने दम तोड़ दिया था। उसका शव मुजफ्फरपुर स्टेशन पर पड़ा था। इसके लिए किसे दोषी माना जाए? खबर है कि कुछ रियायतों के साथ ‘लॉकडाउन’ की अवधि अब 30 जून तक बढ़ाई जा रही है। ऐसी स्थिति में मजदूूरों को, जो पिछले दो महीने से भी अधिक समय से अपने घर जाने के लिए यहां-वहां धक्के खा रहे हैं, उनको उनके घर पहुंचाने के लिए सरकारें फौरन समुचित प्रबंध करें, इसके साथ ही उनके खाने और पानी का भी इंतजाम हो।
निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

 फिर खुली कलई

दुनिया का सबसे शक्तिशाली और सभ्य कहा जाने वाला धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र अमेरिका इन दिनों श्वेत-अश्वेत संघर्ष से जूझ रहा है। वहां जनता और प्रशासन का संघर्ष रुकने की बजाय और बढ़ता जा रहा है, जो एक गंभीर बात है। अमेरिका में पहले ही एक लाख से अधिक लोग कोरोना महामारी में अब तक मारे जा चुके हैं। दूसरी तरफ, चीन के साथ भी उसका वाक्-युद्ध लगातार बढ़ता ही जा रहा है। अमेरिका में जल्द ही राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं। इस चुनाव पर श्वेत-अश्वेत संघर्ष, कोरोना संघर्ष और चीन से तनातनी का असर पड़ना स्वाभाविक ही है और अब तो यही प्रमुख चुनावी मुद्दे भी होने वाले हैं। आखिर चालीस शहरों में कफ्र्यू लगाने की स्थिति कोई मामूली बात नहीं। अश्वेतों के प्रति नस्लवादी नफरत ने अमेरिका के भद्र लोक की कलई खोल दी है।
शकुंतला महेश नेनावा
गिरधर नगर, इंदौर

 मास्क बना हथियार

कोरोना वायरस दिन-प्रतिदिन भयानक रूप धारण करता जा रहा है। देश में अब इस वायरस से ग्रस्त लोगों की संख्या दो लाख से ऊपर जा रही है। इस महामारी के साथ मनुष्य का जो युद्ध चल रहा है, उसमें जीत के लिए फेस मास्क एक अहम हथियार बन गया है। अब लोग किसी भी कारण से घर से निकल रहे हैं, तो मास्क पहनकर ही बाहर आ रहे हैं। सरकार का भी निर्देश है कि अगर कोई नागरिक बिना मास्क पहने घर से बाहर निकलता है, तो उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जाएगी। देश-विदेश में फेस मास्क अब एक अहम उत्पाद बन गया है और अब तो बजार में रंग-बिरंगे मास्क बिकने शुरू हो गए हैं। चीन में जब जिंदगी पटरी पर लौटने लगी, तब वहां की कंपनियां तेजी से फेस मास्क बनाने लगीं। वहां रोजाना हजारों की संख्या में अब मास्क की मांग आने लगी है। भारत ने भी फेस मास्क बनाकर निर्यात का काम शुरू कर दिया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि अब लोगों को अपनी जान बचाने के लिए फेस मास्क जैसे हथियार को हमेशा अपने साथ रखना होगा।
निशा, दिल्ली विश्वविद्यालय

सरकार की उदारता

देश जिस संकट के दौर से अभी गुजर रहा है, इसमें सरकार की सबसे अहम भूमिका है। उसके द्वारा अब तक लिए गए निर्णय अत्यधिक महत्वपूर्ण रहे हैं। कोरोना के प्रसार पर रोक लगाने के लिए सरकार द्वारा अनेक तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। उसने कृषि और कुटीर उद्योगों में आ रही मुश्किलों पर गौर करते हुए उचित हल निकाला है। लेकिन सवाल अब भी यही उठता है कि क्या परिस्थितियां पहले की तरह सामान्य हो पाएंगी? आम जनता की सारी उम्मीदें सरकार से ही लगी हुई हैं। सरकार का यह कर्तव्य ही नहीं, जिम्मेदारी भी है कि वह लोगों को आ रही समस्याओं के समाधान निकाले और आम जनता को चिंता-मुक्त करे

मिताली, नई दिल्ली

 

ओपिनियन / शौर्यपथ / पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन की सेनाओं में तनातनी जारी है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी स्थिति को मजबूत बनाने में जुटे हुए हैं। हालांकि पिछले कई वर्षों में जिस तरह बातचीत से तनाव कम किए गए, इस बार भी सफलता मिल सकती है, लेकिन इस वक्त अहम सवाल यह है कि क्या चीन के सैनिक उस जमीन को खाली करने पर राजी हो जाएंगे, जो उन्होंने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का उल्लंघन करके अपने कब्जे में ले ली है?

चीन तभी संतुष्ट होगा, जब जमीनी हकीकत बदल जाए। इसके लिए कुछ मीटर पीछे तक दोनों सेना को लौटने के लिए कहा जाए और कब्जाई गई ज्यादातर जमीन बीजिंग को सौंप दी जाए। चीन कब्जे वाले क्षेत्र को खाली करने पर भी सहमत हो सकता है, लेकिन बदले में वह कई रियायतों की उम्मीद करेगा, जिनमें वास्तविक नियंत्रण रेखा के भारतीय हिस्से में सीमा पर इन्फ्रास्ट्रक्चर यानी ढांचागत विकास कार्यों को रोकना भी शामिल हो सकता है। संभव है, बनाए गए ढांचों को तोड़ने की मांग भी करे। 2017 में जब डोका ला विवाद हुआ था, तब भी दोनों तरफ की सेनाएं पीछे हटी थीं। चीन ने सड़क-निर्माण की अतिरिक्त गतिविधियां तो रोक दी थीं, लेकिन कब्जे वाले इलाके में अपनी स्थिति को मजबूत बनाने का काम उसने जारी रखा। कुल मिलाकर, जमीनी सच्चाई चीन के हित में बदल गई थी, हालांकि आगे किसी दखल को लेकर भारत ने पहले ही अपनी कार्रवाई रोक दी थी। इसीलिए चीन के इस व्यवहार का जब तक भारत कोई प्रभावी काट नहीं ढूंढ़ लेता, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर इस तरह की घटनाओं के होने की न सिर्फ आशंका बनी रहेगी, बल्कि ऐसी घटनाएं ज्यादा तीव्रता से हो सकती हैं।

चीन के इस खेल का एक और पहलू है। भारत-चीन सीमा पर ही नहीं, दक्षिण चीन सागर, ताइवान जलडमरूमध्य और पीत सागर पर भी ऐसा ही कुछ चल रहा है। चीन की हर कार्रवाई, जब तक कि वह किसी दूसरी कार्रवाई से जुड़ी हुई न हो, एक मजबूत व जवाबी सैन्य प्रतिक्रिया के लिए आवश्यक धमकी नहीं मानी जा सकती। हालांकि, बदलते वक्त में इसी तरह की ‘एकल कार्रवाई’ की शृंखला इलाके में शक्ति-संतुलन में उल्लेखनीय बदलाव का वाहक बनती है। इसी कारण दक्षिण चीन सागर और कई विदेशी द्वीपों पर चीन का कब्जा व सैन्यीकरण उस स्थिति में पहुंच गया है कि सिर्फ सैन्य प्रतिक्रिया (संभवत: युद्ध) से ही बीजिंग को रोका जा सकता है। जाहिर है, जोखिम भरा यह कदम शायद ही कोई उठाए। हां, ताकतवर मुल्कों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे चीन के आगामी अतिक्रमण को रोकने के प्रयास करें।

चीन के इस खेल को हमने वर्षों से भारत-चीन सीमा पर देखा है। यहां छोटी-छोटी गतिविधियां लगातार होती रही हैं, जिनका भारतीय पक्ष विरोध करते रहे हैं, मगर वे चीन द्वारा हड़पी जा रही जमीन को फिर से वापस पाने के लिए किसी सैन्य आक्रमण का रास्ता अपनाने को तैयार नहीं हैं। हमें कब्जा जमाने की चीन की इस नीति को समझना होगा और इसके खिलाफ एक प्रभावी रणनीति बनानी होगी। उन इलाकों में, जहां हमें सामरिक लाभ हासिल है, वहां वास्तविक नियंत्रण रेखा की अस्पष्टता का अपने हित में उपयोग करना होगा। इसके बाद ही यथास्थिति बहाल करने के लिए सौदेबाजी करते समय हम कुछ दबाव बनाने की स्थिति में होंगे।

चीन के इस खेल के तीसरे पक्ष पर भी ध्यान देने की जरूरत है। दरअसल, चीन किसी भी देश की आर्थिक और सैन्य क्षमताओं को सावधानीपूर्वक आंकने के बाद ही अपना रुख तय करता है। यह कभी-कभी गलत भी हो सकता है, क्योंकि चीन के नेता अपनी सोच को लेकर आत्म-केंद्रित होते हैं। दूसरे देशों के साथ आपसी संबंधों में सामरिक चपलता, यहां तक कि विश्वासघात के प्रति भी, वहां सांस्कृतिक पूर्वाग्रह है। इसी कारण, 1962 के युद्ध के बाद सीमा पर पुरानी स्थिति बहाल करने संबंधी चीन का दावा ऐसा कथित राहत-पैकेज था, जो प्रचलित यथास्थिति को ही औपचारिक जामा पहनाता रहा। 1985-86 में पूर्वी क्षेत्र में वांडुंग की घटना के बाद भी पैकेज प्रस्ताव को इस तरह फिर से परिभाषित किया गया कि पूर्व में, जो सबसे बड़ा विवादित क्षेत्र है, सार्थक छूट हासिल करने के लिए भारत को एक समझौते की दरकार है, जिसके बदले में चीन पश्चिमी क्षेत्र में उचित, हालांकि अपरिभाषित छूट हासिल करेगा। फिर इसके बाद यह संदेश दिया गया कि किसी भी समझौते में चीन को तवांग सौंपना होगा।

अब जो हम देख रहे हैं, वह बताता है कि चीन अपने उसी लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। उसके व्यवहार से पता चलता है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा के सटीक सीमांकन पर अस्पष्टता से उसे यह अवसर मिला है कि वह स्थानीय व सामरिक लाभ हासिल करने के लिए कुछ जगहों पर विवाद को हवा दे, साथ-साथ ऐसा माहौल भी बनाया जाए कि भारत के साथ किसी समझौते में उसका हाथ मजबूत है।

कुछ विश्लेषकों का सुझाव है कि चीन को उकसाने वाला ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए कि भारत मजबूर होकर अमेरिका के करीब जाए। इसका निहितार्थ यह भी है कि चीन जिन देशों को अपना विरोधी मानता है, उनसे उसकी दूरी भारत पर दबाव घटा सकती है। हालांकि यह अजीब तर्क है। यह संकेत करता है कि भारत की विदेश नीति पर फैसला तो वाशिंगटन में हो रहा है, लेकिन उसे चीन की प्राथमिकताओं के मुताबिक बदल दिया जाना चाहिए? भारत की विदेश नीति को नई दिल्ली में बनाया जाना चाहिए, जो देश के सर्वोत्तम हित में है। यह नई दिल्ली का अनुभव रहा है कि अन्य तमाम ताकतवर मुल्कों के साथ-साथ भारत और अमेरिका के आपसी मजबूत रिश्तों से चीन की चुनौती का बेहतर प्रबंधन करने की क्षमता और कुशलता बढ़ती है। भारत दुनिया से जितना अलग-थलग होगा, चीन का उस पर उतना ही ज्यादा दबाव पड़ने का खतरा बढ़ेगा।

बेशक अभी अमेरिका के साथ किसी तरह के सैन्य समझौते की संभावना नहीं है, लेकिन दुनिया के ताकतवर राष्ट्रों का एक मजबूत व विश्वसनीय जवाबी प्रतिक्रिया-तंत्र बनाना एक विवेकपूर्ण रणनीति है, जो चीन की परभक्षी नीतियों के प्रति भारत की चिंताओं को समझे। हालांकि, चीन के साथ शक्ति-संतुलन बनाने के लिए भारत को अपनी क्षमता भी दुरुस्त करनी होगी, जो कि मौजूदा विवाद के मूल में है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) श्याम सरन, पूर्व विदेश सचिव

 

 

मुंगेली / शौर्यपथ / कोरोना संक्रमण काल के इस कठिन समय में लोगो को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराना राज्य शासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है। लोगो को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने मे राज्य शासन लगातार कार्य कर रही है, ताकि लोगों को किसी तरह की परेशानी न हो। मुंगेली जिले मे दिल्ली, आध्रप्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र जैसे कई अन्य राज्यों से प्रतिदिन आने वाले श्रमिको के ईलाज की व्यवस्था की गई है।
इन श्रमिको के ईलाज के लिए 1487 क्वारेंटाइन सेंटर स्थापित किये गये है। इन क्वारेंटाइन सेंटर मे जिले के लगभग 31 हजार श्रमिको को अस्थाई रूप् से ठहराया गया है। इन श्रमिको के ईलाज के साथ-साथ उन्हे भोजन, आवास, पेयजल, दवाई, आदि की सुविधा दी जा रही है। क्वारेंटाइन सेंटर मे संदिग्ध श्रमिक की जांच मे जिन श्रमिको मे कोरोना पॉजिटिव पाया जाता है। उन्हे उपचार हेतु अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) रायपुर भेजा जा रहा है।
इसके अलावा जिला मुख्यालय मे त्वरित उपचार हेतु सौ बिस्तर की कोविड-19 अस्पताल और 48 बिस्तर की जिला स्तरीय क्वारेंटाइन सेंटर की स्थापना की गई है। इसी तरह क्वारेंटाइन सेंटर मे यदि किसी व्यक्ति को कोरोना के लक्षण (खंासी, सिर दर्द, सांस लेने मे तकलीफ) दिखाई देगी। तो उन्हे पृथक कर ईलाज हेतु जिले मे स्थापित सर्व सुविधा युक्त आईसोलेशन केंद्र मे रखा जाएगा। इन सर्व सुविधा आईसोलेशन केंद्र मे डॉक्टरो का दल तैनात रहेंगे और मरीजो का बेहतर ईलाज कर स्वास्थ्य लाभ प्रदान करेंगे।

// सर्वाधिक परिवारों को 100 दिनों का रोजगार देने में देश में दूसरे स्थान पर
// इस साल अब तक 25.97 लाख ग्रामीणों को काम, 1114 करोड़ का मजदूरी भुगतान
// मुख्यमंत्री और पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री ने लॉक-डाउन के दौरान उत्कृष्ट कार्य के लिए पंचायत प्रतिनिधियों और मैदानी अधिकारियों की पीठ थपथपाई

  रायपुर / शौर्यपथ / मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) के विभिन्न मानकों पर लॉक-डाउन के बावजूद छत्तीसगढ़ का उत्कृष्ट प्रदर्शन जारी है। मुख्यमंत्री बघेल के निर्देश पर चालू वित्तीय वर्ष 2020-21 के शुरूआती दो महीनों में ही प्रदेश ने साल भर के लक्ष्य का 37 फीसदी काम पूरा कर लिया है। इस वर्ष अप्रैल और मई माह के लिए निर्धारित लक्ष्य के विरूद्ध प्रदेश में 175 प्रतिशत काम हुआ है। इन दोनों मामलों में छत्तीसगढ़ देश में सर्वोच्च स्थान पर है। दो माह के भीतर सर्वाधिक परिवारों को 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराने में छत्तीसगढ़ दूसरे स्थान पर है। यहां 1996 परिवारों को 100 दिनों का रोजगार दिया जा चुका है।
चालू वित्तीय वर्ष में अब तक पांच करोड़ तीन लाख 37 हजार मानव दिवस रोजगार का सृजन कर 25 लाख 97 हजार ग्रामीण श्रमिकों को काम उपलब्ध कराया गया है। इस दौरान 1114 करोड़ 27 लाख रूपए का मजदूरी भुगतान भी किया गया है। कोविड-19 का संक्रमण रोकने लागू देशव्यापी लॉक-डाउन के बावजूद प्रदेश में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाए रखने में मनरेगा के अंतर्गत व्यापक स्तर पर शुरू किए कार्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विपरीत परिस्थितियों में इसने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को रोजी-रोटी की चिंता से मुक्त करने के साथ ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है।
मुख्यमंत्री बघेल और पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री टी.एस. सिंहदेव ने लॉक-डाउन के दौरान मनरेगा में उत्कृष्ट कार्यों के लिए पंचायत प्रतिनिधियों और मैदानी अधिकारियों की पीठ थपथपाई है। उन्होंने प्रदेश भर में सक्रियता एवं तत्परता से किए गए कार्यों की सराहना करते हुए सरपंचों, मनरेगा की राज्य इकाई तथा जिला एवं जनपद पंचायतों की टीम को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस संक्रमण के खतरे की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच यह बड़ी उपलब्धि है। उनकी कोशिशों से कोविड-19 से बचाव और लाखों लोगों को रोजगार मिलने के साथ ही बड़ी संख्या में आजीविकामूलक सामुदायिक एवं निजी परिसंपत्तियों का निर्माण हुआ है।
केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा मनरेगा के अंतर्गत चालू वित्तीय वर्ष के प्रथम दो महीनों अप्रैल और मई के लिए दो करोड़ 88 लाख 14 हजार मानव दिवस रोजगार सृजन का लक्ष्य रखा गया था। इसके विरूद्ध प्रदेश ने पांच करोड़ तीन लाख 37 हजार मानव दिवस रोजगार का सृजन कर 175 प्रतिशत उपलब्धि हासिल की है। यह इस वर्ष के लिए निर्धारित कुल लेबर बजट साढ़े तेरह करोड़ मानव दिवस का 37 प्रतिशत है। चालू वित्तीय वर्ष में अब तक 1996 परिवारों को 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराया गया है। मनरेगा में प्रदेश में प्रति परिवार औसत 23 दिनों का रोजगार प्रदान किया गया है, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 16 दिन है। इस मामले में छत्तीसगढ़ पूरे देश में शीर्ष पर है।
प्रदेश में मनरेगा श्रमिकों को समयबद्ध मजदूरी भुगतान के लिए मस्टर रोल बंद होने के आठ दिनों के भीतर द्वितीय हस्ताक्षर कर 98 प्रतिशत फण्ड ट्रांसफर ऑर्डर जारी कर दिए गए हैं। बीते अप्रैल और मई महीने के दौरान कुल 1114 करोड़ 27 लाख रुपए का मजदूरी भुगतान श्रमिकों के खातों में किया गया है। कोविड-19 के चलते विपरीत परिस्थितियों में श्रमिकों के हाथों में राशि पहुँचने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अच्छा असर पड़ा है। इसने रोजगार की चिंता से मुक्त करने के साथ ही ग्रामीणों की क्रय-क्षमता भी बढ़ाई है। प्रदेश भर में काम कर रहे मजदूरों की संख्या मई महीने के आखिरी में 25 लाख 27 हजार पहुंच गई है। अप्रैल के आखिरी में यह संख्या 15 लाख 74 हजार तथा मार्च के आखिरी में 57 हजार 536 थी। अभी प्रदेश की 10 हजार 155 ग्राम पंचायतों में कुल 44 हजार 964 कार्य चल रहे हैं। इनसे मौजूदा लॉक-डाउन में ग्रामीण जन-जीवन में आया ठहराव दूर हो गया है।

दुर्ग / शौर्यपथ / कलेक्टर डा. सर्वेश्वर नरेंद्र भूरे ने आज पुलगांव नाका स्थित वृद्धाश्रम का निरीक्षण किया। यहां उन्होंने व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया और बुजुर्गों से बातचीत की। वहां पर उपलब्ध सुविधाओं से उन्होंने संतोष जताया। उन्होंने कहा कि अभी सफाई व्यवस्था पूरी तरह मुकम्मल नहीं है। अभी मानसून आने से पूर्व पूरे कैंपस की अच्छे से सफाई कराइये और हर दिन बेहतर सफाई होनी चाहिए। अधिकारी इसकी लगातार मानिटरिंग करें।
कलेक्टर ने बुजुर्गों से पूछा कि आप लोगों को यहां सभी सुविधाएं मिल रही हैं न। बुजुर्गों ने सुविधाओं से संतोष जताया। कलेक्टर ने पूछा कि नाश्ता और खाना किस समय पर मिलता है और इसकी गुणवत्ता कैसी रहती है। बुजुर्गों ने बताया कि खाना समय पर मिल जाता है और अच्छा रहता है। इस संबंध में हम लोग संतुष्ट हैं। विभागीय अधिकारी समय-समय पर आते रहते हैं और व्यवस्था के बारे में पूछते रहते हैं। यहां हमारी देखभाल करने वाला स्टाफ भी काफी अच्छा है। स्वास्थ्यगत परेशानी हो तो यहां कार्यरत नर्स से कह देते हैं।
कलेक्टर ने बुजुर्गों से कहा कि आप सभी कोरोना संक्रमण के संबंध में भी सजग रहें। बीच-बीच में हाथों को सैनिटाइज करते रहें। मास्क हमेशा लगाए रहें, सोशल डिस्टेंसिंग का हमेशा ध्यान रखें रहें। कलेक्टर ने अधिकारियों से आश्रम में रह रहे बुजुर्ग जनों के स्वास्थ्य जांच के बारे में जानकारी ली। अधिकारियों ने बताया कि महीने में तीन बार स्वास्थ्य परीक्षण कराया जाता है। इसके अतिरिक्त यहां एक नर्स भी रहती हैं जो हमेशा बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर नजर रखती है। किसी तरह की दिक्कत आने पर तुरंत अस्पताल भेजे जाने की कार्रवाई की जाती है।
कलेक्टर ने समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों से कहा कि वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्ग नागरिक अच्छा समय बिताएं। हम उनका पूरा ख्याल रख पाए, इस बाबत जिस तरह से प्रयास किए जा सकते हैं। वे सुनिश्चित कराएं। इसके अतिरिक्त कैंपस काफी सुंदर हो, साफ सुथरा हो। इसके अतिरिक्त बुजुर्गों के आराम से बैठने के लिए एक बहुत छोटा सा गार्डन भी बनाने के निर्देश उन्होंने दिए। समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों ने बताया कि वे नियमित रूप से संस्था की मानिटरिंग करते हैं और बुजुर्गों से पूछकर उनकी सुविधा का पूरा ध्यान रखते हैं। कोरोना संक्रमण से बचाव को लेकर आश्रम में सैनिटाइजेशन के साथ ही इस संबंध में लगातार जागरूकता फैलाने की दिशा में हम काम कर रहे हैं। इस दौरान एसडीएम खेमलाल वर्मा, नजूल अधिकारी एवं डिप्टी कलेक्टर अरुण वर्मा सहित अन्य अधिकारी उपस्थित थे।

दुर्ग / शौर्यपथ / नीलामी में अधिक ऑफर मूल्य होने के बाद भी दुर्ग नगर पालिका निगम द्वारा परिवादियों को दुकान का आवंटन नहीं किया गया और जमा की गई अमानत राशि की मांग करने पर अमानत राशि का भुगतान भी नहीं किया। इसे आचरण को व्यवसायिक कदाचार ठहराते हुए जिला उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष लवकेश प्रताप सिंह बघेल, सदस्य राजेन्द्र पाध्ये और लता चंद्राकर ने दो अलग-अलग मामलों में नगर पालिक निगम दुर्ग के आयुक्त पर 6 लाख 43 हजार रुपये हर्जाना लगाया।
अनावेदक का जवाब
नगर पालिक निगम दुर्ग ने सिर्फ परिवादिनी डॉ. प्राची मिश्रा के मामले में ही अपना जवाब प्रस्तुत किया जिसमें उसने कहा कि परिवादिनी ने अपनी जमा राशि जानबूझकर वापस नहीं ली है और वह किसी प्रकार की क्षतिपूर्ति राशि पाने की हकदार नहीं है।

फोरम का फैसला
प्रकरण में पेश दस्तावेजों एवं प्रमाणों तथा दोनों पक्षों के तर्को के आधार पर जिला उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष लवकेश प्रताप सिंह बघेल, सदस्य राजेन्द्र पाध्ये और लता चंद्राकर ने यह सिद्ध पाया कि परिवादिनी द्वारा प्रस्तुत निविदा को मेयर इन काउंसिल द्वारा दिनांक 20 जून 2012 को निरस्त करके इसकी सूचना परिवादिनी को दी गई तब परिवादिनी ने छत्तीसगढ़ नगर पालिका निगम अधिनियम 1956 के तहत अपील प्रस्तुत की जिसका निराकरण दिनांक 30 अक्टूबर 2015 को किया गया और परिवादिनी ने इसके बाद 27 अगस्त 2016 को आयुक्त नगर निगम दुर्ग के समक्ष पुनर्विचार आवेदन दायर किया और दिनांक 3 नवंबर 2017 को अपनी अमानत राशि की मांग की। मांगे जाने पर भी अमानत राशि का भुगतान ना कर अनावेदक ने व्यवसायिक कदाचार किया है और परिवादिनी को क्षति पहुंचाई गई है।
जिला उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष लवकेश प्रताप सिंह बघेल, सदस्य राजेन्द्र पाध्ये और लता चंद्राकर ने नगर निगम दुर्ग आयुक्त पर 6 लाख 43 हजार रुपये हर्जाना अधिरोपित किया, जिसके तहत पहले मामले में अमानत राशि 486350 रुपये, मानसिक क्षतिपूर्ति स्वरूप 20000 रुपये, वाद व्यय के रूप में 1000 रुपये देना होगा और दूसरे मामले में अमानत राशि 125000 रुपये, मानसिक कष्ट के एवज में 10000 रुपये एवं वाद व्यय के रुप में 1000 देना होगा। साथ ही अमानत राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज भी भुगतान करना होगा।

पहला मामला
कादंबरी नगर दुर्ग निवासी नेत्र चिकित्सक डॉ. श्रीमती प्राची अरोरा ने दिनांक 13 सितंबर 2011 को दुर्ग नगर निगम द्वारा आमंत्रित निविदा में भाग लेते हुए दो दुकानों के लिए निविदा भरकर प्रति दुकान 243175 रुपये के हिसाब से कुल रकम 486350 रुपये अमानत राशि के रूप में जमा कराई। निविदा खोलने पर परिवादिनी का ऑफर मूल्य सबसे अधिक था और उसे दुकान पाने की पात्रता थी। परिवादिनी द्वारा बार-बार दुर्ग नगर निगम से संपर्क करने पर भी मात्र आश्वासन दिया जाता रहा लेकिन कोई कार्यवाही नहीं की गई और दिनांक 28 मई 2012 को दुकानों की दर कम होने के आधार पर निविदा अस्वीकार कर दी गई। इसके बाद दिनांक 06 जून 2012 को परिवादिनी को यह जानकारी दी गई कि लिपिकीय त्रुटिवश निविदा निरस्त होने की सूचना जारी हो गई थी, अब दुकान आवंटन का निर्णय एवं विचार एमआईसी में किया जाएगा।
दिनांक 25 जून 2012 को परिवादिनी की निविदा अस्वीकार कर दी गई। परिवादिनी ने 12 सितंबर 2012 को नगर निगम की अपील समिति के समक्ष अपील प्रस्तुत की जिसका निराकरण लंबे समय तक नहीं किए जाने के कारण परिवादी ने उच्च न्यायालय बिलासपुर में रिट याचिका प्रस्तुत की जिसमें माननीय उच्च न्यायालय ने अपील कमेटी के समक्ष मामले का निराकरण कराने के निर्देश दिए। दिनांक 30 अक्टूबर 2015 को परिवादिनी की अपील को नगर निगम की अपील समिति ने निरस्त कर दिया किंतु परिवादिनी द्वारा जमा कराई गई अमानत राशि 486350 को वापस नहीं किया।

दूसरा मामला
इसी प्रकार दूसरा मामला परिवादिनी अनीता अरोरा का है जिसने सुभाष नगर प्राथमिक शाला दुर्ग स्थित दुकान क्रमांक 9 के संबंध में अमानत राशि 125000 जमा करके दिनांक 22 जून 2011 को नगर निगम द्वारा आमंत्रित निविदा में भाग लिया था। इस मामले में भी पहले मामले की तरह ही नगर निगम द्वारा व्यवहार किया गया।

कोरबा / शौर्यपथ / कोरबा जिले में अन्य प्रांतों से आये सभी प्रवासी श्रमिकों को कोरोना जांच की रिपोर्ट आ जाने पर ही क्वारेंटाइन सेंटरों से रिलीज किया जायेगा। जांच रिपोर्ट पाजिटिव आने पर संक्रमित श्रमिक को ईलाज के लिए विशेष कोविड अस्पताल भेजा जायेगा। 14 दिन की क्वारेंटाइन अवधि पूरी कर चुके श्रमिकों की जांच रिपोर्ट निगेटिव मिलने पर ही उन्हें घर जाने दिया जायेगा। ऐसे सभी श्रमिकों को घर में भी अगले 14 दिनों तक होम क्वारेंटाइन में रहने का शपथ पत्र भरना होगा। कलेक्टर श्रीमती किरण कौशल ने इस संबंध में जरूरी निर्देश भी जारी किये हैं। श्रीमती कौशल ने कोविड प्रोटोकाल के अनुसार 14 दिन की क्वारेंटाइन अवधि पूरी करने के बाद क्वारेंटाइन सेंटर में रखे गये लोगों को रिलीज करने के लिए प्राधिकृत अधिकारियों की भी नियुक्ति की है। नगर निगम कोरबा क्षेत्र में स्थित क्वारेंटाइन सेंटरों से लोगों को रिलीज करने के लिए नगर निगम आयुक्त श्री एस. जयवर्धन प्राधिकृत अधिकारी होंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में क्वारेंटाइन सेंटरों से 14 दिन की अवधि पूरी करने वाले जांच रिपोर्ट प्राप्त लोगों को रिलीज करने के लिए संबंधित अनुभाग के एसडीएम प्राधिकृत अधिकारी बनाये गये हैं। पाली तहसील के क्वारेंटाइन सेंटरों से लोगों को घर जाने के लिए छोडऩे का निर्णय तहसीलदार पाली करेंगे।
कलेक्टर श्रीमती किरण कौशल ने आज यहां बताया कि अन्य राज्यों से कोरबा लौटे लोगों को कोविड प्रोटोकाल के आधार पर 14 दिन क्वारेंटाइन में रखा गया है। इस अवधि में ऐसे सभी लोगों और श्रमिकों का आरटीपीसीआर पद्धति से कोरोना टेस्ट कराया जाता है। 14 दिवस क्वारेंटाइन अवधि पश्चात भी यदि किसी श्रमिक का आरटीपीसीआर का रिपोर्ट जांच उपरांत प्राप्त नहीं हुआ है तो रिपोर्ट प्राप्त होने तक ऐसे श्रमिकों को किसी भी स्थिति में घर नहीं जाने दिया जायेगा। क्वारेंटाइन सेंटर में रह रहे लोगों को निगेटिव रिपोर्ट प्राप्त होने पर ही अगले 14 दिवस के लिए होम क्वारेंटाइन का शपथ पत्र भरवाकर ही छोड़ा जायेगा। क्वारेंटाइन सेंटर में रह रहे जिन लोगों का क्वारेंटाइन अवधि के भीतर आरटीपीसीआर टेस्ट नहीं हो पाया है उनकी 14 दिन बाद रैपिड टेस्ट किट से जांच की जायेगी और रिपोर्ट निगेटिव प्राप्त होने पर ही अगले 14 दिवस के लिए होम क्वारेंटाइन का शपथ पत्र भरवाकर छोड़ा जायेगा। 14 दिन के बाद क्वारेंटाइन अवधि पूरा करने के बाद छोड़े गये सभी श्रमिकों की निगरानी संबंधित क्षेत्र के सचिव, रोजगार सहायक, मितानीन-एक्टिव सर्विलेंस टीम के माध्यम से की जायेगी।


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