August 27, 2026
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    बेलपत्र चढ़ाओ, किताबें छोड़ो! परीक्षा पास कराने का ‘नया फार्मूला’ या छात्रों के भविष्य से खिलवाड़? Featured

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    आस्था अपनी जगह, शिक्षा अपनी जगह... लेकिन जब आस्था के नाम पर मेहनत, पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी को गौण बताया जाने लगे, तब सवाल उठना लाजिमी है।

    शौर्यपथ लेख। 

    देश में लाखों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। परीक्षा में गड़बड़ी और पेपर लीक जैसी घटनाओं से उनका भविष्य प्रभावित हो रहा है। ऐसे दौर में विद्यार्थियों को हौसला देने, मेहनत करने और शिक्षा के महत्व को समझाने की जरूरत है। लेकिन यदि किसी लोकप्रिय कथावाचक के मंच से यह संदेश जाए कि परीक्षा में सफलता के लिए पढ़ाई से ज्यादा कोई धार्मिक विधि कारगर हो सकती है, तो यह केवल आस्था का विषय नहीं रह जाता—यह सामाजिक जिम्मेदारी का सवाल बन जाता है।

    पंडित प्रदीप मिश्रा के एक कथित वक्तव्य में परीक्षा में सफलता के लिए शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने की विधि बताए जाने और इसे करने से पढ़ाई की जरूरत न होने जैसी बात कही गई। यदि वक्तव्य का आशय वास्तव में यही है, तो सवाल बेहद सीधा है—क्या वर्षों तक किताबों के बीच मेहनत करने वाले विद्यार्थियों की जगह अब परीक्षा की तैयारी के लिए पूजा-पाठ को पर्याप्त मान लिया जाए?

    अगर बेलपत्र चढ़ाने से बिना पढ़े परीक्षा पास होना संभव है, तो फिर स्कूल-कॉलेज, कोचिंग संस्थान, शिक्षक, किताबें और शिक्षा पर सरकार द्वारा खर्च किए जा रहे करोड़ों रुपये किस काम के?

    क्यों न परीक्षा से पहले विद्यार्थियों को किताबों की जगह बेलपत्र थमा दिया जाए?

    क्यों न मेहनत, अनुशासन और अध्ययन की जगह धार्मिक विधि को परीक्षा की तैयारी का ‘शॉर्टकट’ घोषित कर दिया जाए?

    लेकिन हकीकत यह है कि परीक्षा की उत्तर पुस्तिका में विद्यार्थी की आस्था नहीं, उसका ज्ञान और उसकी तैयारी उसके उत्तर लिखती है।

    आस्था व्यक्ति को मानसिक शक्ति दे सकती है, विश्वास दे सकती है, सकारात्मक सोच दे सकती है—इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन आस्था को शिक्षा का विकल्प बनाकर प्रस्तुत करना एक अलग बात है। यही वह सीमा है, जिस पर जिम्मेदार सार्वजनिक व्यक्तियों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

    पंडित प्रदीप मिश्रा कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं। उनके प्रवचन सुनने वाले लाखों अनुयायी हैं। ऐसे में मंच से निकला प्रत्येक शब्द केवल व्यक्तिगत विचार नहीं रह जाता, उसका प्रभाव समाज के बड़े वर्ग तक पहुंचता है। खासकर विद्यार्थी यदि यह संदेश ग्रहण कर लें कि पढ़ाई किए बिना भी किसी धार्मिक उपाय से परीक्षा में सफलता हासिल की जा सकती है, तो इसका नुकसान सीधे उनके भविष्य को हो सकता है।

    आज का छात्र पहले ही परीक्षा प्रणाली, प्रतियोगिता, बेरोजगारी और पेपर लीक जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में उसे यह बताने की जरूरत है कि “मेहनत करो, ज्ञान हासिल करो, असफलता से मत डरो और दोबारा प्रयास करो।”

    न कि यह कि “पढ़ाई छोड़ो और किसी विधि के भरोसे परीक्षा देने चले जाओ।”

    कटाक्ष यह भी है कि यदि वास्तव में कोई ऐसी धार्मिक विधि है जो बिना अध्ययन के परीक्षा में सफलता दिला सकती है, तो फिर शिक्षा मंत्रालय को पाठ्यक्रम बदल देना चाहिए। किताबों की जगह बेलपत्र, नोट्स की जगह पूजा की विधि और परीक्षा की तैयारी की जगह कथा का आयोजन कर देना चाहिए!

    लेकिन क्या ऐसा संभव है?

    नहीं।

    क्योंकि वास्तविक जीवन में सफलता के पीछे मेहनत, ज्ञान, अभ्यास, अनुशासन और निरंतर प्रयास होता है।

    धार्मिक आस्था किसी व्यक्ति की निजी शक्ति हो सकती है, लेकिन उसे विद्यार्थियों के भविष्य का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।

    पंडित प्रदीप मिश्रा जैसे लोकप्रिय कथावाचक से अपेक्षा इसलिए अधिक है क्योंकि उनके शब्दों का प्रभाव सामान्य व्यक्ति से कहीं अधिक है। लाखों लोग उन्हें सुनते हैं, उनकी बातों को महत्व देते हैं और उनके बताए रास्ते पर चलने का प्रयास करते हैं। इसलिए सार्वजनिक मंच से विद्यार्थियों और परीक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर कही गई बातों में जिम्मेदारी और सावधानी अपेक्षित है।

    क्योंकि किसी विद्यार्थी की एक गलत धारणा उसके वर्षों की मेहनत पर भारी पड़ सकती है।

    और यदि कोई छात्र पढ़ाई छोड़कर केवल किसी धार्मिक उपाय के भरोसे परीक्षा देने बैठ जाए और असफल हो जाए, तो उस असफलता की जिम्मेदारी कौन लेगा?

    क्या तब उसके हाथ में किताब होगी या केवल बेलपत्र?

    यही असली सवाल है।

    आस्था का सम्मान होना चाहिए, लेकिन शिक्षा का स्थान शिक्षा ही ले सकती है। परीक्षा में सफलता का सबसे विश्वसनीय मंत्र आज भी वही है—पढ़ो, समझो, अभ्यास करो और मेहनत करो।

    कथावाचक का काम समाज में विश्वास जगाना है; लेकिन ऐसा विश्वास नहीं, जो विद्यार्थी को मेहनत से दूर कर दे।

    क्योंकि भगवान पर भरोसा रखने में कोई बुराई नहीं, मगर परीक्षा की कॉपी में उत्तर लिखने के लिए कलम भी चलानी पड़ती है और उसके पीछे पढ़ाई भी करनी पड़ती है।

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