शौर्यपथ विशेष
नगर पालिक निगम क्षेत्र में कहां क्या गतिविधियां संचालित हो रही हैं, नागरिक सुविधाओं की वास्तविक स्थिति क्या है, स्वच्छता, वैधानिक बाजार, स्ट्रीट वेंडर्स की सूची, उनके पुनर्वास व संचालन की व्यवस्था—इन सभी की समुचित जानकारी और निगरानी प्रशासनिक मुखिया होने के नाते नगर निगम आयुक्त की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। किंतु दुर्ग नगर पालिक निगम क्षेत्र में इन जिम्मेदारियों के निर्वहन को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
दुर्ग जिले के सभी प्रशासनिक अधिकारियों को भिलाई के सुपेला संडे मार्केट का इतिहास भली-भांति ज्ञात है। प्रारंभिक लापरवाही के चलते वह बाजार धीरे-धीरे विशाल रूप लेता गया और जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हुई तो उसे हटाने के लिए कई बार पुलिस बल का सहारा लेना पड़ा। विवाद, तनाव और अव्यवस्था लंबे समय तक प्रशासन के लिए सिरदर्द बनी रही।
अब ठीक वैसी ही स्थिति की आहट दुर्ग निगम क्षेत्र में सुनाई दे रही है। सुराना कॉलेज से चर्च रोड के बीच पिछले कुछ हफ्तों से एक नया बाजार संचालित हो रहा है। हैरानी की बात यह है कि इस बाजार को लेकर निगम प्रशासन द्वारा किसी प्रकार की वैधानिक अनुमति नहीं दी गई है। बाजार में यह चर्चा जरूर फैलाई जा रही है कि शनिचरी बाजार के व्यापारी यहां व्यापार कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। वर्षों से शनिचरी बाजार में व्यापार करने वाले गिने-चुने लोग ही यहां नजर आते हैं, जबकि बड़ी संख्या में बाहरी क्षेत्रों से आए व्यापारी इस मार्ग पर दुकानें सजा चुके हैं।
कुछ व्यापारियों का दावा है कि शुरुआती एक-दो सप्ताह निगम द्वारा रसीदें काटी गईं, लेकिन इसके बाद निगम के कर्मचारी और अधिकारी इस ओर नजर ही नहीं आए। शनिचरी बाजार की आड़ में ऐसे व्यापारी भी यहां व्यापार कर रहे हैं, जो दुर्ग निगम क्षेत्र के निवासी तक नहीं हैं। सवाल यह है कि कौन व्यापारी, किस आधार पर, किसके निर्देश पर इस असंवैधानिक बाजार का संचालन कर रहा है—और यह सब जानते हुए भी निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल की ओर से कोई ठोस प्रशासनिक पहल क्यों नहीं की जा रही?
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इस मुद्दे का उद्देश्य किसी के रोजगार या व्यापार को चोट पहुंचाना नहीं है, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और भविष्य के विवादों को रोकना है। यदि यह बाजार निगम द्वारा वैधानिक रूप से स्वीकृत है तो इसकी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए और राजस्व के रूप में इसे निगम की आय का स्रोत बनाया जाना चाहिए। और यदि अनुमति नहीं है, तो फिर निगम आयुक्त अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किस प्रकार कर रहे हैं, यह प्रश्न स्वाभाविक है।
इसी बीच निगम प्रशासन में अनियमितताओं की लंबी फेहरिस्त भी चर्चा में है। कभी राजस्व मामलों में निचले स्तर के कर्मचारियों पर नोटिसों की बौछार, तो कभी दूषित जल आपूर्ति के मामलों में प्लेसमेंट कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराना—जबकि सड़कों पर आवारा पशुओं का आतंक, जगह-जगह गड्ढे, अधूरे विकास कार्य, बदबू और प्रदूषण से जूझते मोहल्ले शहर की पहचान बनते जा रहे हैं। कर्मचारियों को समय पर वेतन न मिलना और वर्षों से कार्यरत अनुभवी अधिकारियों की मौजूदगी के बावजूद गोपनीय दस्तावेज प्लेसमेंट कर्मचारियों को सौंपना, जिसके परिणामस्वरूप निगम की महत्वपूर्ण एक्सेल शीट का वायरल होना—इन सबने आयुक्त सुमित अग्रवाल की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अतिक्रमण हटाने की कार्रवाइयों में कथित भेदभाव, लिखित शिकायतों के बावजूद आयुक्त सुमित अग्रवाल का मौन, और निगम कार्यालय से जुड़ी गोपनीय फाइलों का चयनित रूप से बाहर आना भी चर्चा का विषय बना हुआ है। यहां तक कि निगम के भीतर चपरासी से लेकर ग्रेड-3 कर्मचारी और कथित पत्रकार के बीच हुए माफीनामा सौदे में आयुक्त सुमित अग्रवाल की भूमिका को लेकर भी निगम गलियारों में कानाफूसी है।
ऐसे हालात में अब निगाहें दुर्ग निगम क्षेत्र के विधायक एवं प्रदेश सरकार में स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव और महापौर अलका बाघमार पर टिक गई हैं। आम जनता ने उन्हें शहर में सुशासन की उम्मीद के साथ चुना है। भले ही निगम प्रशासन तकनीकी रूप से एक स्वतंत्र संस्था हो, लेकिन शहर की बदहाली की जिम्मेदारी अंततः जनप्रतिनिधियों पर ही आकर टिकती है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल अवैध बाजार, अव्यवस्था और प्रशासनिक अनियमितताओं पर ठोस कदम उठाकर दुर्ग शहर को सुशासन की दिशा में ले जाएंगे, या फिर सब कुछ यूं ही चलता रहेगा और शहर अगली बड़ी प्रशासनिक उलझन की ओर बढ़ता रहेगा? अवैध बाजार के संचालन में आयुक्त की कथित निष्क्रियता आज शहर में चर्चा का केंद्र बन चुकी है, और आने वाले दिनों में प्रशासन की कार्रवाई ही यह तय करेगी कि यह चेतावनी समय रहते सुनी गई या नहीं।