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वाकया सुप्रीम कोर्ट में प्रवासियों का

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नजरिया / शौर्यपथ / यह वाकया सुप्रीम कोर्ट में प्रवासियों से जुडे़ एक मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वत: संज्ञान लेते हुए इस मामले की सुनवाई शुरू की थी। सुनवाई के दौरान फोटोग्राफर केल्विन कार्टर से जुड़ी एक प्रसिद्ध घटना का भी जिक्र आया और ऐसे हालात में हस्तक्षेप करने के इच्छुक लोगों के लिए एक मुहावरे का इस्तेमाल किया गया। वह मुहावरा है- दुर्भाग्य के पैगंबर! इसमें कोई दोराय नहीं कि तार्किक तौर पर किसी संदर्भ में समय व स्थान को ध्यान में रखते हुए विषय से जुड़े उपलब्ध साक्ष्यों के समुचित विश्लेषण के बाद ही कोई निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए या कोई बयान देना चाहिए। अन्यथा इसे अप्रासंगिक या अनुचित माना जाता है। इस मुहावरे के साथ-साथ जिस घटना का जिक्र किया गया, वह दूसरों के एक विशेष आचरण को शायद अनुचित ठहराने के लिए ही था।
वैसे इस मुहावरे का इस्तेमाल कोई नया नहीं है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जलवायु परिवर्तन के खिलाफ संघर्ष कर रहे कार्यकर्ताओं के लिए इसी मुहावरे का इस्तेमाल किया था। अत: ऐसा नहीं है कि भारतीय सुप्रीम कोर्ट में ही पहली बार किसी ने इसका इस्तेमाल किया। हालांकि, फर्क यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक राजनीतिक बयान दे रहे थे, जबकि भारतीय कोर्ट में प्रवासियों की तकलीफ पर सुनवाई के दौरान इसका इस्तेमाल किया गया।
शब्दकोश के मुताबिक, इस मुहावरे का अर्थ है : ‘किन्हीं फैसलों या कदमों के नकारात्मक नतीजों की आशंका के प्रति आगाह करने वाला शख्स।’ फिर यह प्रवासियों से जुड़े तथ्यों पर कैसे लागू होता है? प्रवासियों की तकलीफों को सबने देखा है, सुबूत मौजूद हैं, बूढ़े, बच्चे, औरतें, दिव्यांग बिना भोजन-पानी की उचित व्यवस्था के सैकड़ों किलोमीटर पैदल सड़कों पर चले, भय के मारे उन्हें कंटेनरों तक में सफर करना पड़ा, उनमें से कई की सड़क हादसे में मौत तक हो गई। क्या इन तथ्यों से इनकार किया जा सकता है? यह स्थिति लगभग एक महीने तक रही, बल्कि देश के कुछ हिस्सों में तो आज तक बनी हुई है।
बाद में जब टे्रन सेवाओं की शुरुआत हुई, तो इसके साथ राज्य सरकारों की मंजूरी की शर्त नत्थी कर दी गई। फिर यात्रियों के पंजीकरण की प्रक्रिया जटिल थी, तो हताश लोग लंबी कतारों में खडे़ होने लगे। स्वाभाविक है, स्पष्ट सूचना के अभाव में पुलिस स्टेशनों और रेलवे स्टेशनों पर भारी भीड़ उमड़ पड़ी।
फिजिकल डिस्टेंसिंग की सावधानी कई जगह मजाक बनकर रह गई। अनेक जगह गरीबों के लिए खाना-पानी और छत को लेकर भी भारी भ्रम थे। फिर उनमें से कई को पुलिस की मार भी खानी पड़ी। भारत जैसे विशाल देश में जब अनेक राज्य कुछ उदासीन दिख रहे थे और केंद्र व कुछ राज्यों के बीच तालमेल दुरुस्त नहीं था, तब एक आम इंसान क्या करता? क्या किसी नुमाइंदे ने शुरू में ही सामने आकर यह कहा कि वे किसी को इतनी लंबी दूरी पैदल चलने की अनुमति नहीं देंगे और जिन्हें अपने गांव जाना ही है, उनके लिए बसों की व्यवस्था की जाएगी? देश के ज्यादातर नागरिक भी इन बदनसीब लोगों को बेबसी से देख रहे थे। उनमें से कई लोगों और संस्थाओं ने पैदल प्रवासियों को भोजन-पानी मुहैया कराने की चेष्टा की, मगर यह पर्याप्त नहीं था। कई जगहों पर तो मददगार लोगों को यह कहते हुए सहायता करने से रोका गया कि इससे संक्रमण फैलेगा और प्रशासन स्वयं प्रवासियों की जरूरतों का इंतजाम कर रहा है।
ऐसे में, कई लोगों को कानून के राज द्वारा संचालित लोकतंत्र में अदालती हस्तक्षेप ही एकमात्र विकल्प लगा। और सर्वोच्च न्यायालय का स्वत: संज्ञान लेना इस बात की तस्दीक करता है कि इस समस्या से निपटने के लिए सुविचारित पहल की कमी रही। इस तथ्यात्मक पृष्ठभूमि में कोर्ट का दरवाजा खटखटाने को क्या नकारात्मकता ढूंढ़ने का प्रयास कहा जा सकता है? और यदि कोई नागरिक या संगठन अपना यह फर्ज निभाता है और उचित नजरिये के साथ अदालत की सहायता करना चाहता है, तो इसकी देश में परंपरा रही है। इन तथ्यों को देखते हुए केल्विन कार्टर का जिक्र अप्रासंगिक है। प्रवासी मजदूरों की परेशानियों और दुखों को कोर्ट में उठाने वालों की तुलना गिद्ध से करना दुर्भाग्यपूर्ण है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) संजय पारिख, वरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट

 

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शौर्यपथ