अन्य खबर /शौर्यपथ /
रंग का एक अर्थ रौनक़ भी है और दूजा है आनंद। तीजा मतलब है उत्सव। जीवन में जितने रंग उतनी तरंग और उमंग और जीवन उतना ही रंगारंग...! होली का एक दिन इसी जीवन का दर्पण है।
हमारे दैनंदिन में रंग कम हुए तो होली के रंग में भंग पड़ गया। अब न ढोलक की थाप, न महीना पहले से अंगड़ाई लेने वाला फाग। न नगाड़े की वैसी गूंज, न दिल खोलकर मज़ाक़, बस एक औपचारिक-सा रिवाज।
एकरंग या कहें कि बेरंग ज़िंदगी का अक्स बन गई है होली। अबके अवसर है कि हम होली के बहाने जीवन में फिर से बेफ़िक्री, दोस्ती, मस्ती, संगीत, रिश्तों और सामूहिकता के रंग बिखेरें और हर दिन कर लें त्योहार-सा गुलज़ार!
दिन के पांच बज रहे हैं। हवा मौसम बदल जाने की सूचना दे रही है। लेकिन मेरी आंखों के सामने अजीब-सा मंज़र है। देख रहा हूं कि जैसे धूल खाए पौधे हवा में धीरे-धीरे हिलते हैं, वैसे ही कुछ धूल खाए चेहरे मुम्बई की इस सड़क पर हिल रहे हैं। विषाद से भरे, एकदम रंगहीन! मास्क में ढके सैकड़ों चेहरे निहायत ही बोझिल चाल से चले आ रहे हैं, जैसे किसी ने सबका उत्साह निचोड़ लिया हो। कोई बीच-बीच में मास्क सरका देता है। कोई थोड़ा मुस्करा देता है। कुछ जम्हाई लेते हैं। कुछ भागे जा रहे हैं। मैं खड़ा हूं। अंधेरी की इस दसवीं मंजि़ल की खिड़की से जहां तक देखता हूं एक ग़ुुबार-सा दिखता है। सहसा ज़ेहन में वो गीत कौंध आता है, ‘ये क्या जगह दोस्तो... ये कौन सा दयार है!’ लेकिन वक़्त गीत का नहीं है। अचानक ही याद आता है, चाय तो बनी नहीं। सूरज तो डूब जाएगा, सांझ भी होगी, लेकिन बिना चाय के एक लेखक की सांझ कैसे हो सकती है? उठता हूं। चाय बनाकर फिर खिड़की पर बैठ जाता हूं। नज़र फिर सड़क पर जम जाती है। देख रहा हूं कि मेरा ही पड़ोसी, जिससे आज तक कभी बात न हुई वो लैपटॉप पीठ पर लादकर भारी मन से लौट रहा है। उसकी हालत देखकर मुझे सुबह उसके ऑफ़िस जाने का वाक़या याद आता है। याद आता है कि ठीक सुबह वो लिफ़्ट से जाते हुए हौले-से मुस्काया था। संवाद की इस सबसे आसान और मधुर भाषा में यूं तो मुझे कोई मौलिकता नज़र नहीं आई थी, लेकिन एक महानगर में कोई अनजान शख़्स आपकी तरफ़ देखकर मुस्करा रहा था ये भी क्या कम ख़ुश होने वाली बात नहीं थी! जवाब में मैं भी मुस्काया था। और दोनों लिफ़्ट में लगे फ्लोर डिस्प्ले के कम होते नम्बर गिनने लगे थे। ग्राउंड फ्लोर पर आते-आते अचानक उसका फ़ोन बज उठा था। फोन उठाते ही उसका चेहरा एकदम रंगहीन हो गया था। मैंने देखा, फोन उठाकर वो कहने लगा, ‘सॉरी यार, पीपीटी नहीं बन पाया है, क्या करूं? इतना प्रेशर है कि रात को ठीक से सो भी नहीं पाया। आज ऑफ़िस आने का मन नहीं था क्या करूं! अच्छा... ऐसा कह रहे थे सर... हां तो आता हूं न, जस्ट वेट यार।’ उसकी बात सुनकर मैं सोचने लगा था- आज क्या होगा इस आदमी का? तभी मेरा मोबाइल बज उठा। स्क्रीन पर मैंने देखा, एक पुराने मित्र बनारस से फोन कर रहे थे। उन्होंने जानना चाहा कि होली में गाने के लिए मैं ढोलक कहां से ख़रीद सकता हूं। मैंने मित्र की बात ध्यान से सुनी थी। उनकी दिली तमन्ना थी कि मैं उनको ढोलक के बारे में तफ़सील से जानकारी दूं। मुझे ये जिज्ञासा सुंदर लगी थी। मैंने बनारस की कुछ दुकानों का पता बताया था। दुकानों के नाम सुनकर उनकी आवाज़ में उत्साह बढ़ गया था। पूछने लगे थे, ‘तुम न आअोगे? कहो तो एक हारमोनियम भी ले लूं... आ जाते तो यार रंग जम जाता...’ मैंने कहा, ‘देखो, आने का सोचा तो है, पर क्या करूं समझ नहीं आ रहा।’ कभी-कभी लगता है मेरी भी हालत मेरे पड़ोसी जैसी हो गई है। रोज़ लगता है कि पीपीटी नहीं बन पाई है। मित्र का फोन कट गया था। और फिर मेरा पड़ोसी और मैं दोनों दिनभर अपने-अपने काम में डूब गए थे। लेकिन अभी सामने दिख रहा सूरज अब अलविदा की अंतिम हंसी हंस रहा है। उसको देखकर मुझे ढोलक वाला दोस्त याद आता है। सोचता हूं मेरा दोस्त भी कोई खलिहर आदमी नहीं है। एक अदद नौकरी, कुछ ज़िम्मेदारियां उसके भी पास हैं। लेकिन बावजूद उसके इस आदमी ने होली के लिए ढोलक ख़रीदने का बीड़ा उठा लिया है। ये भी ग़ज़ब है। सोचता हूं एक बार कॉल करके पूछ लूं कि भाई शाम हो गई... तुमने ढोलक ख़रीदी है कि नहीं? लेकिन मेरी नज़र सामने से आ रहे मेरे पड़ोसी पर टिक जाती है। मैं सुबह की स्मृति को आंख से हटाकर फिर उसे देख रहा हूं, उसके चेहरे पर विषाद की एक विशाल रेखा खिंच गई। उस रेखा से असंतोष झांक रहा है। ऐसा लग रहा है ये आदमी स्वयं ढोलक बन गया है। एक फटी हुई ढोलक। पीपीटी न बना पाने के कारण आज इसने सुन ली है और अपना सारा फ्रस्ट्रेशन अपने चेहरे पर जमा कर लिया है। मुझे दया आती है। फिर से मुझे लिफ़्ट में जाने का मन होता है। सोचता हूं, जाऊं और पूछ दूं कि कहो भाई साहब, कैसे हैं आप? कैसा रहा आज का दिन? पर डर लगता है। कहीं मेरा पड़ोसी रोने लगे तो? कई बार देखा है बस स्टैंड पर, लोकल में; जुहू, वर्सोवा के पत्थरों के बीच में लुढ़कते चंद बेबस आंसुओं को फटी हुई ढोलक बन जाते हुए। डरता हूं... नहीं-नहीं इस हालत में शायद मुस्काना भी सही नहीं होगा। कुछ कहना भी ठीक नहीं होगा। मन उदास हो चला है। इस भरे बसंत में ज़िंदगी को यूं रंगीनियत से दूर होकर एक मशीन बनते देखना कितना दुःखद है, बताया नहीं जा सकता है। अब चाय पीकर बाहर निकलने का मन होता है। देख रहा हूं कि चौराहे पर चाय-कॉफ़ी, पकौड़े के साथ उठते सिगरेट के धुएं में ऑफ़िस के बोझ को कम किया जा रहा है। कहीं गप्पें, कहीं हुल्लड़ और टांगखिंचाई के साथ दिनभर का सारा फ्रस्ट्रेशन भूलने का प्रयास किया जा रहा है। कई जगह वडा पाव को हाथ में लेकर सोशल नेटवर्किंग साइट पर स्टोरी अपडेट करते युवा बता रहे हैं कि उनके पास वाक़ई समय नहीं है। तभी मित्र ने फिर कॉल किया। ‘आ जाअो, ढोलक ले ली है... अबकी रंग जमेगा।’ मित्र के मुंह से फिर रंग, ढोलक और जमेगा जैसे तीन शब्दों ने मेरी प्राण ऊर्जा को स्पंदित कर दिया है। मैं भी न जाने किस भाव में आकर कह देता हूं, ज़रूर आऊंगा मेरे भाई... पक्का आऊंगा… और पक्का रंग जमेगा... और सिर्फ़ मैं ही नहीं आऊंगा, बाक़ी अपने आस-पास के लोगों से कहूंगा कि ज़िम्मेदारियां ज़िंदगी को बोझिल बना चुकी हैं, दौड़ अंतहीन लग रही है तो रुककर कुछ देर सुस्ताने में कोई कठिनाई नहीं है। त्योहार जीवन की फटी हुई ढोलक में नई थाप देकर हमें नवीन ऊर्जा से भरने के लिए आते हैं। लाख व्यस्तता हो... ज़िंदगी की पीपीटी में त्योहार के रंगों को भरे रखना ज़रूरी है। नहीं तो जीवन मेरी खिड़की से दिख रही सांझ की तरह कब बोझिल हो जाएगा हमें पता भी न चलेगा। पता कहां चल रहा है!