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इंस्पायरिंग:लोग आपसे बेकार की उम्मीदें नहीं करते, बस अलग एटीट्यूड चाहते हैं - लिओनार्डो डिकैप्रियो

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इंस्पायरिंग/शौर्यपथ/

मुझे अच्छे-से याद है। जब मैंने बोलना शुरू किया था, तो पेरेंट्स से मेरा पहला वाक्य यह था- ‘मैं एक्टर बनना चाहता हूं। जब 14 या 15 साल का हुआ तो क्लासिक फिल्में देखता था। महीनों तक उन्हें देखा करता था। लगभग सभी ग्रेट क्लासिक्स मैंने देखी होंगी। मैं अपने आप से कहता था कि एक दिन मैं भी ऐसा ही कुछ कर दिखाउंगा। मुझे लगता है मेरी यह प्यास, यह ड्राइव ही मुझे मेरी मंजिल की तरफ धकेलती रही। इसी उम्र में मुझे रॉबर्ट डी नीरो के साथ एक फिल्म करने का मौका मिला। मुझे तभी यह अहसास हो गया था कि यह ऐसा गिफ्ट है, जो मेरे साथ जीवन भर रहने वाला है।

मुझे ताकत मिली मेरे इर्द-गिर्द रहने वाले दोस्तों और मेरे परिवार वालों से। वो मेरे साथ इतने ईमानदार रहे कि मेरे पैरों ने कभी जमीन छोड़ी ही नहीं। वो मुझे जिंदगी में आने वाली हर कठिनाई के लिए तैयार करते रहे। मैं साधारण परिवार से हूं। मैंने पब्लिक स्कूल से पढ़ाई की लेकिन खूब प्यार करने वाले पैरेंट्स मिले। मेरे दोनों ही पैरेंट्स अद्भुत हैं, लेकिन पिता खास रहे। मैंने अपने जीवन में उनसे समझदार इंसान नहीं देखा। उन्होंने मेरी जिंदगी को हर सकारात्मकता की ओर मोड़ा। आज अगर मैं पर्यावरण कार्यकर्ता, एक्टर या इंसान... जो भी हूं उन्हीं के कारण हूं, उन्हीं से प्रभावित हूं।

मैंने ऑडिशन दिए तो रिजेक्शन भी मिले। 12 साल तक केवल रिजेक्शन ही मिले। पिता मुझे ऑडिशन के लिए ले जाते थे। वो अपने शहर से लॉस एंजिलिस शिफ्ट हो गए। जब मैंने ऑडिशन के प्रति अपना नजरिया बदला तब मुझे काम मिला। मैंने यह सोचना शुरू किया कि मैं इस काम पर निर्भर नहीं हूं, इसी से मेरा भविष्य तय नहीं होना है। मैं खुद को समझाता रहा कि यही अंतिम सत्य नहीं है।

कभी इस बात पर खुद को नहीं आंका कि मुझे काम मिला या नहीं। मैंने पाया कि लोग आपसे बेकार उम्मीदें नहीं करते हैं वो केवल ‘अलग’ एटिट्यूड की तलाश में होते हैं। अपने को अलग दिखाने के लिए आप क्या करते हैं, यह मायने रखता है। यह आप तभी कर पाएंगे जब रिजेक्शन का डर आपसे जुदा होगा।

वो बनने की कोशिश मत कीजिए, जो आप हैं नहीं। अपने सच के साथ जीना सीखिए। जब आप खुद में बदलाव शुरू करेंगे तो वो अंदर से होगा। खुद पर और अपनी क्षमताओं पर यकीन करें। असफलता और रिजेक्शन का मतलब यह नहीं है कि आप लायक नहीं हैं। कई बार इसका मतलब केवल मामूली-सा बदलाव लाना होता है। असफलता को स्वीकारिए, और उससे सीखिए।’(विभिन्न सोशल मीडिया इंटरव्यू से)

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PANKAJ CHANDRAKAR