रायपुर / शौर्यपथ /
आंकड़े बताते है कि रमन सिंह ने 15 साल सिंर्फ सत्ता सुख भोगा, भाजपा को आगे बढ़ाने का तनिक भी कार्य नहीं किया। आज भी भाजपा की कुंडली मे राहु-केतु बनकर बैठे है रमन सिंह और उनके गुलाम, इसलिए बुरा दौर देखना अभी बाकी है।
छत्तीसगढ़ भाजपा के भाग्य में अब अच्छे दिन जल्द आने वाले नही है।क्योंकि भाजपा की कुंडली में राहु केतु की तरह बैठे रमन सिंह व उनके कुछ गुलाम नेता पनौती बनकर संगठन की साख को निरंतर गिराने में लगे हैं। जिसका दुष्परिणाम पिछले साढ़े तीन सालों में हमने देख लिया है। इसी कड़ी में खैरागढ़ उपचुनाव का निर्णय भी सामने हैं। यहां भी भाजपा को करारी हार झेलनी पड़ी है।
अब निरंतर यह सवाल यह उठ रहा है कि भाजपा में आखिर कब हार का यह सिलसिला चलता रहेगा? क्या कार्यकर्ता निकट भविष्य में जीत का स्वाद चख पाएंगे? क्या भाजपा पुन: सत्ता में वापस आ पाएगी? परंतु इन सवालों का जवाब भारतीय जनता पार्टी के किसी नेता के पास नहीं है।
भारतीय जनता पार्टी एक संघर्षशील पार्टी है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल जी आडवाणी जी सहित लाखों भाजपा कार्यकर्ताओं ने अथक परिश्रम कर इसे खड़ा किया है। इन्हीं श्रध्येयजनों की बदौलत भाजपा ने जनता के दिल में जगह बनाई तब जाकर कहीं सत्ता नसीब हुई। परंतु छत्तीसगढ़ मैं इनकी यह विरासत संभाले नहीं संभल रही है। यहां भाजपा बदहाली के दौर से गुजर रही है।
हकीकत बयां करते आंकड़े
2003 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 50 सीटों के साथ 39 फ़ीसदी मत प्राप्त किए थे वहीं कांग्रेस को 37 सीटों के साथ 36.41 फ़ीसदी वोट तथा एनसीपी को 1 सीट के साथ 7.2 फ़ीसदी वोट मिले थे। उसी प्रकार 2008 के चुनाव में भाजपा को 40.33 फ़ीसदी वोट के साथ 50 सीटें मिली वहीं कांग्रेस को 37.63 फ़ीसदी वोटों के साथ 38 सीटें प्राप्त हुई थी यहां बसपा को 6 फ़ीसदी वोट मिले थे। उसी प्रकार 2013 में 49 सीटों के साथ भाजपा 41.04त्न वोट , 38 सीटों के साथ कांग्रेस को 40.29त्न वोट , और 1सीट कर के साथ बसपा को 4.24त्न वोट मिले थे।
2018 मे कांग्रेस ने प्रचंड जीत हासिल की और 43त्न वोट शेयर के साथ 67 सीटों पर कब्जा जमाया वही भाजपा को 33 प्रतिशत वोटों के साथ 15 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। यहां पर जोगी कांग्रेस ने 7.5त्न वोट शेयर के साथ 7 सीटों पर कब्जा जमाया।
रमन ने भाजपा को आगे नहीं बढ़ाया सिर्फ सत्ता सुख भोगा
अब यहां सवाल उठता है कि डॉ रमन सिंह की सरकार ने आखिर 15 साल छत्तीसगढ़ में किया क्या। मैंने जो आंकड़े प्रस्तुत किए हैं उस आधार पर यह समझ आता है कि भाजपा की जीत हमेशा ही बैसाखी के सहारे हुई है। 2003 में विद्याचरण शुक्ल के नेतृत्व में राकपा को मिला 7त्न वोट, 2008 में बसपा को मिले 6त्न वोट, 2013 में बसपा को ही मिले 4 फ़ीसदी वोट भाजपा की जीत आसान करते नजर आए हैं। उसी प्रकार 2018 में कांग्रेस से टूटकर बनी जोगी कांग्रेस पार्टी ने 7.5फीसदी वोट पाकर भाजपा को और पीछे कर दिया।
पिछले 19 सालों के आंकड़े बता रहे हैं कि 3 बार के मुख्यमंत्री रहे रमन सिंह और छत्तीसगढ़ भाजपा संगठन के सर्वेसर्वा रहे सौदान सिंह के नेतृत्व भाजपा नेतृत्व ने सिर्फ सत्ता का सुख भोगा है। अपनी पार्टी और विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने तनिक भी कार्य नहीं किया। अगर किया होता तो ऐसी दुर्गति भाजपा के आज की पीढ़ी को नहीं देखनी पड़ रही है।
बेहतर भविष्य की उम्मीद नहीं
बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ चलिए जो हुआ सो हुआ कह कर भी बात को खत्म किया जा सकता था। परंतु 2018 में करारी हार के बाद भी रमन सिंह का अहंकार नहीं टूटा और छत्तीसगढ़ भाजपा में अपना कब्जा बरकरार रखने के लिए गुलामों की फौज बना डाली। आज भारतीय जनता पार्टी में ऊपर से लेकर नीचे तक के पद रमन सिंह की सहमति के बाद ही बांटे गए हैं जिनमें अयोग्य लोगों की भरमार है। सोशल इंजीनियरिंग नाम की कोई चीज यहा भाजपा की राजनीति में है ही नहीं। छत्तीसगढ़ भाजपा में कुर्मी,तेली, सतनामी,आदिवासी समाज के चेहरे सिर्फ उपस्थिति दर्ज कराने के लिए है। इन लोगों की समाजिक पकड़ शून्य है। परिणाम यह है कि भूपेश बघेल के सत्ता संभालने के बाद अब तक उन्हें घेरने में भाजपा नाकाम रही है। भ्रष्टाचार के मुद्दे बिखरे पड़े हैं परंतु उन मुद्दों को उठाने का माद्दा भाजपा में नहीं है। वे सिर्फ विज्ञप्ति जारी कर अपने कर्तव्यों का संपूर्ण निर्वहन करना मान कर चल रहे हैं।
रमन सिंह ने खुद कुछ करते ना किसी को करने देते
आज भारतीय जनता पार्टी में परिवर्तन की बेहद आवश्यकता है। कांग्रेस से लडऩे के लिए भाजपा में लड़ाको की कमी नहीं है परंतु अवसर नहीं मिलने के कारण वह सामने दिखाई नहीं पड़ते हैं। संशय का माहौल भाजपा में हैं। अब तो कार्यकर्ताओं का भी आत्मविश्वास लडख़ड़ाने लगा है। छत्तीसगढ़ भाजपा का हर निर्णय रमन सिंह के ऊपर है। वह जो चाहते वही होता है। भाजपा विधायकों के विरोध के बाद भी धरमलाल कौशिक को उन्होंने नेता प्रतिपक्ष बनाया। विष्णुदेव साय के रूप में बेहद कमजोर नेतृत्व राज्य भाजपा को उन्होंने दिया है। यही कारण है कि भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार अब नहीं हो पा रहा है। फलस्वरूप प्रदेश में कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की ताकत भाजपा नहीं जुटा पा रही है।
ऐसे में खैरागढ़ उपचुनाव का निर्णय भी पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराने वाला है। पर पता नही संगठन के राष्ट्रीय नेतृत्व को रमन सिंह ने क्या घुट्टी पिलाई है कि उन पर हद से ज्यादा भरोसा किया जा रहा है। इन परिस्थितियों में मुझे तो लगता है की जब तक छत्तीसगढ़ भाजपा में कोई बड़ी बगावत नहीं होगी तब तक यह संगठन ढर्रे पर ही चलेगा और अपनी दुर्दशा का गवाह खुद ही बनेगा।